पर्वतपुरा बीट में कार्य कर रही है दो वन समितियॉ राशन की दुकान भी करते है संचालित

आशीष यादव, धार

जिले के पर्वतपुरा बीट में अंजनाई व सेमलीपुरा ग्राम वन समितियॉ है। इन दोनों समिति के माध्यम से समिति के सदस्य राशन की दुकान भी संचालित करते हैं, सभी लाभार्थी वहॉ से राशन प्राप्त करते है। इसके अलावा वन विभाग के वर्किग प्लान के अनुसार डेव्लपमेंट गतिविधि भी की जाती है। जिसमें समितियों की सक्रिय भागीदारी होती हैं। जंगल में आगजनी होने पर समितियो का पूरा सहयोग किया जाता है। समितियों के सदस्य आग बुझाने में पूरी मदद करते है। रात्रि गश्ती या अन्य कारणों से वन स्टॉफ जब आता है इस कार्य में भी वन समिति के सदस्यों का सहयोग रहता है। इस प्रकार जंगलो का विकास वन विभाग व ग्राम वन समिति के माध्यम से देखने को मिलता है।

ज्ञात हो कि वनमण्डल धार के वनक्षेत्र में वानिकी प्रजातियों की लगभग 50 प्रजातियां मुख्यतः पाई जाती है जिनमें अधिकांश प्रजातियों में प्रतिवर्ष पुष्पन, फलन एवं बीज उत्पादन होता है। विभाग द्वारा प्रतिवर्ष रोपण हेतु वानिकी प्रजातियों का बीज क्रय किया जाता है जो संभवतः वनक्षेत्रो से ही संग्रहित किया जाता है। स्थानीय महत्व की वानिकी प्रजातियों को सूचीबद्ध कर उनके पुष्पन, फलन, बीज तैयार होने, बीज संग्रहण की अवधि, प्रतिकिलो बीज की संख्या, अंकुरण क्षमता, बीज उपचार, उत्पादन क्षेत्र, उत्पादन मात्रा, संग्रहण की पद्धति का प्रायोगिक अध्ययन कर वनमण्डल की समस्त सातो परिक्षेत्रो में स्थानीय अमले द्वारा बीज संग्रहण कार्य किया जाता है । परिक्षेत्र मुख्यालय स्तर पर प्रतिदिन संग्रहित बीज की प्रजाति, मात्रा संग्रहण कार्य, संग्रहण स्थल की प्रतिदिन प्रविष्टी की जाती है । संग्रहित बीज के फलों फलियों को सुखाकर, आवश्यक उपचार कर, शुद्ध बीज प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार रोपण हेतु तैयार बीज की मात्रा का भी प्रजातिवार रिकार्ड तैयार किया जाता है। बीजरोपण हेतु उपयुक्त वृक्षारोपण क्षेत्र, जलग्रहण क्षेत्र को सूचीबद्ध किया जाता है। प्रत्येक स्थलवार पशु अवरोधक खंती ,कन्टूर ट्रेंच, सतत कन्टूर ट्रेंच, जल संचयन संरचना एवं मिट्टी चेकडेम की मात्रा की गणना कर आवश्यक बीज का आंकलन किया जाता है। इस प्रकार स्थलवार आवश्यक बीज का प्रजातिवार बटवारा कर स्थानीय अमले को रोपण विधि, अवधि से अवगत कर आवंटित किया जाता है। आवंटन के पूर्व पशु अवरोधक खंती की मेढ़ पर रोपित की जाने वाली प्रजातियों - प्रोसोपिस, बबूल, खैर, बैर, कस्टार, रिंझा के बीजो का समान अनुपात में मिश्रण तैयार किया जाता है। वृक्षारोपण क्षेत्रो में मृत पौधो के स्थान पर खाली गड्ढो में बीजारोपण हेतु चयनित प्रजातियों - सीताफल, महुआ, बेहड़ा, चिरोल, सीसु, ईमली, जंगल जलेबी, साजा, सिरस, महारूख आदि को पृथक-पृथक आवंटन किया जाता है। उपचारित क्षेत्रो में निर्मित कन्टूर ट्रेंच ,सतत कन्टूर ट्रेंच ,जल संचयन संरचना की मेढ़ एवं मिट्टी चेकडेम की मेढ़ हेतु शेष संग्रहित समस्त प्रजातियों का मिश्रण तैयार कर वितरित किया जाता है। रोपण के लिए पशु अवरोधक खंती की मेढ़ पर मिट्टी में तीन लाईनों में हंसिये/गैती से खोदकर 15 से.मी. के अन्तराल पर मिश्रित प्रजाति के एक-एक बीज का रोपण किया जाता है। खैर, प्रोसोपिस, बबूल, कस्टार, रिंझा आदि प्रजातियों के मिश्रण में 20 से 30 हजार बीज प्रति किलो आते है। तीन लाईनों में बुवाई करने पर एक किलोग्राम बीज 500 र.मी. हेतु पर्याप्त होगा। इसी प्रकार उपचारित संरक्षित क्षेत्रो में निर्मित कन्टूर टेंªच सतत कन्टूर ट्रेंच, जल संचयन संरचना की मेढ़ की मिट्टी में हंसिये/गैती से तीन लाईनों में 15 से.मी. के अन्तराल में मिश्रित प्रजातियों को रोपण किया जाता है। 





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