डॉ पुनित संजय सकलेचा ने इतिहास खंगालकर गुरूदेव राजेन्द्र सूरीजी के बारे में जानकारी की साझा~ यशवंत जैन

 गुरू सप्तमी पर विशेष ..., जानिए विश्व पूज्य दादा गुरूदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरीष्वरजी मसा के ऐतिहासिक समय से झाबुआ से रहे जुड़ावे के बारे में, युवा डॉ पुनित संजय सकलेचा ने इतिहास खंगालकर गुरूदेव राजेन्द्र सूरीजी के बारे में जानकारी साझा की

झाबुआ। 19वीं सदी के हिंदुस्तान में कई शासक जहां परतंत्र से विमुख हो, स्वराज के लिए संघर्षरत थे, वही इस धरा पर कई साधक विभाव से विमुख हो स्वभाव में रमणमान हो रहे थे। जहां अखिल भारत फिरंगियो के विरुद्ध क्रांति पर उतर आया था, वही एक विरल विभूति ने जिनशासन में उतर आई साध्वाचार की शिथिलता से आक्रांत हो, क्रियोद्धार का शंखनाद गुंजायमान किया।

इस संबंध में बताते हुए श्वेतांबर जैन समाज के युवा डॉ. पुनित संजय सकलेचा ने बताया कि यह बात 19वीं सदी में हुए महान क्रियोद्धारक, त्रिस्तुतिक, पुनर्स्थापक, योगाचार्य कलिकाल कल्पतरू, भट्ठारक श्रीमद् विजय राजेंद्र सूरीश्वरजी मसा की है। मध्य भारत के पश्चिमी भाग में महाराजा झब्बू के द्वारा संस्थापित एवं गुर्जर प्रदेश से संलग्न एक रियासत जो झाबवा (झाबुआ) रजवाड़ा से पहचानी गई। तत्कालीन झाबुआ राज दरबार में मारवाड़ सिरोही के कई महाजन विशिष्ट कार्यकारी रूप में पदस्थ हुए एवं झाबुआ को ही अपनी कर्मभूमि बनाया। सिरोही महाजनो का वंश आज झाबुआ में मूर्तिपूजक संघ रूप में विद्यमान है। झाबुआ का राजमार्ग (सिरोहिया बाजार-पश्चात लक्ष्मी बाई मार्ग) इनके विशाल भवनों से सुशोभित था।

राजेन्द्र सूरीजी से प्रभावित होकर कई महान हस्तीयां उनकी शरण में आई

मूलतः यह श्रेष्ठीजन दिगंबर एवं श्वेतांबर खरतरगच्छीय परंपरा के अनुयायी थे (इसका - सबसे प्राचीन दादावाड़ी से अनुमान लगाया जा सकता है।) 19वीं सदी के उत्तरार्ध में मालवा, मेवाड़, मारवाड़ एवं उत्तर गुर्जर राजेंद्र सूरीजी के तप-त्याग, ज्ञान-साधना, योग-साधना एवं अद्भुत ब्रह्मचर्य प्रभा से सम्मोहित हो चुका था। कही रजवाड़ो के ठाकुर (आहोर, सियाणा, चिरोला, झाबुआ, रतलाम आदि) तो कही मुल्क के नवाब (जावरा) आप श्री से प्रभावित होकर आपके चरण किन्कर बन गए।

विष्व पूज्य से प्रभावित होकर राजा ने बावन जिनालय के लिए भूमि आवंटित की

डॉ. पुनित सकलेचा ने आगे बताया कि आप श्री के मालवा भ्रमण काल में झाबवा रियासत के राजा ठाकुर उदयसिंहजी राय बहादुर विद्यमान थे। पूर्व से ही राजा उदयसिंहजी ने आपके बारे में काफी श्रवण कर रखा था एवं आप श्री के झाबवा पधारने की विनंती जारी थी। आप श्री के झाबुआ आगमन पर उदय सिंह जी अपने लवाज ़मंे सहित आपको लेने पधारे। आप से प्रभावित हो राजा उदयसिंहजी ने श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के नाम जिनालय बनवाने हेतु भूमि के विस्तारीकरण की अनुमति दी। झाबुआ में पूर्व से ही एक छोटा देरासर विद्यमान था। जिसकी प्रतिष्ठा आचार्य जिनेंद्र सूरीजी म.सा. ने संवत 1856 में छोटे आदिनाथ (मूलनायक स्वरूप) व पुनः संवत-1865 में बड़े आदिनाथ, पद्मप्रभ एवं पारसनाथ भगवान की प्रतिमाजी को गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया।

मप्र के एकमात्र बावन जिनालय झाबुआ में प्रतिष्ठित हुआ

लगभग 90 वर्ष बाद सूरी राजेंद्र की प्रेरणा से तथा उदयसिंहजी एवं जैन संघ के सहयोग से बावन जिनालय के निर्माण का कार्य आरंभ हुआ। विक्रम संवत् 1952 माघ सुदी पूर्णिमा को देवविमान सदृश बावन जिनालय में 251 जिन-बिंबों की अंजन शलाका सह 52 कुलिकाओ में आप श्री के कर कमलों से प्रतिष्ठा संपन्न हुई। (संभवतः यह मध्य भारत का प्रथम प्रतिष्ठित बावन जिनालय है)। मूल गर्भगृह में मूलनायक के दोनों और लघु प्रतिमा पद्मप्रभ एवं शांतिनाथ/महावीर (संशयात्मक) की अंजन शलाका संपन्न हुई।

बावन जिनालय सिरोही स्टाइल में बना है

इसी दिवस झाबवा नगर के पूर्वाेत्तर 2 माइल दूर ’रंगपुरा नगर’ में सशिखर जिनालय में श्यामवर्णीय ’केसरिया नाथ’ आदि 3 बिंबों की भी प्रतिष्ठा की गई (कालांतर में वर्षाकाल में गमनागमन की समस्याओं के चलते एवं जैन निवास के अभाव में हो रही आशातना के कारण रंगपुरा नाथ को बावन जिनालय में मेहमान स्वरूप प्रतिष्ठित किया गया। पूज्य ’धनविजय’ (धनचंद्र सूरी जी) विरचित स्तवना ’दर्शन में पायो रे आदिश्वर’ रंगपुरा केसरिया नाथ पर निर्मित ह।ैरंगपुरा में राजा उदयसिंह जी ने ’राम दरबार’ नामक मंदिर भी बनवाया। जिसमें राम, लक्ष्मण, सीता, सुग्रीव तथा अन्य दरबारी गण की प्रतिमा स्थापित की गई। धन विजयजी ने राज अनुरोध पर जब इस राजदरबार को निहारा, तो इन्होंने इन पात्रों को आत्म-भाव भंगिमा से जोड़कर एक सुंदर संस्तवना रची।

80 वर्ष की उम्र में भी दादा गुरूदेव का आत्म बल मजबूत बना रहा

इसी दिवस आप श्री ने साध्वी विद्याश्रीजी, ’प्रेम श्रीजी’ (त्रिस्तुतिक परंपरा में आप सर्वप्रथम ’प्रवर्तिनी’ पद से विभूषित हुए), मानश्रीजी, मनोहर श्रीजी को बड़ी दीक्षा प्रदान की। यह महोत्सव 15 दिवसीय चला तथा राजा उदय सिंहजी एवं दीवान नारायण राव ने इसका भरपूर लाभ लिया। संवत् 1952 में गुरुदेव 69 वर्ष के थे, फिर भी आपश्री की स्फूर्ति प्रणम्य थी। झाबुआ में 15 दिवसीय चले महोत्सव में नेश्राय पूज्य मुनिराज श्री धन विजयजी, श्री मोहन विजयजी, श्री लक्ष्मी विजयजी एवं श्री रूपविजय जी आदि की रही। आप श्री के चरण बड़नगर चातुर्मास पश्चात् रतलाम पधारे। बड़नगर से मांडवगढ़’ छःरी पालित संघ निकालने की भावभर विनंती पर गुरुदेव ने पुनः बड़नगर तरफ विहार किया। उम्र लगभग 80 वर्ष फिर भी अप्रमत्त दशा में स्वयं उपधि धारण कर पैदल विहार किय। श्वास रोग बढ़ रहा था इधर बड़नगर संघ को रजा दे दी थी। संघ बडनगर से आरंभ हुआ और इधर कृशकाय गुरुदेव को मार्गशीर्ष के जाड़े के प्रकोप से श्वास के साथ ज्वर प्रकोप भी हो गया। संघ चिंतित हुआ। आप श्री ने राजगढ़ की ओर कूच किया। झाबुआ तथा धार नरेश के ’राजवैद्य’ आप के उपचार हेतु सक्रिय भी हुए पर आप श्री शायद भावी जान गए थे। यहां यह कहना भी प्रासंगिक होगा कि झाबुआ, चिरोला नरेश एवं सियाणा के ठाकुर आप श्री के परम भक्त थे व नित आपके फोटो देख कर ही आहार पानी ग्रहण करते थे।

मोहनखेड़ा में बना गुरूदेव का ऐतिहासिक समाधि स्थल

पौष सुदी छठ सायं 8 बजे आपका संथारा पूर्वक अर्हन् स्मरण करते हुए राजगढ़ के ’राजेंद्र उपासरा’ में चतुर्विध संघ सम्मुख देवलोक गमन हुआ। भारतभर की जनता विह्वल हो उठी। मालवा मारवाड़ से भारी संख्या में जनमेदिनी आपके दर्शन हेतु उमर पड़े। धार एवं झाबुआ’ के नरेश लवाज़मे सहित आप श्री के अंतिम दर्शन करने पधारे ।मोहनखेड़ा की भूमि में आपश्री का अग्नि संस्कार किया गया। आज यहां दादा गुरुदेव का स्वर्णिम समाधि मंदिर बना हुआ है। झाबुआ में भी आप श्री के अतुल्य उपकारों से प्रभावित होकर त्रिस्तुतिक संघ ने पुण्य सम्राट श्रीमद् विजय जयंतसेन सूरीश्वरजी जी (तत्कालीन जयंत विजय जी) मसा के नेश्राय में सन् 1976 में गुरु मंदिर की प्रतिष्ठा करवाई। ऐसी सदी के महान क्रियोद्धारक परम पूज्य गुरुदेव को भाव पूर्वक वंदना, नमन एवं श्रद्धानवनत्। ऐसे गुरू को प्रतिवर्ष गुरू सप्तमी पर नमन कर संपूर्ण देश की जनता सहित विश्व में भी अन्य गुरू भक्त गुरूवंदना करते है। गुरूदेव के चरणों में शत-शत, वंदन .... ! जय गुरूदेव .... !

फोटो 012 -ः विश्व पूज्य दादा गुरूदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्र सूरीश्वरजी मसा।

फोटो 013 -ः झाबुआ के श्री ऋषभदेव बावन जिनालय में गुरूदेव द्वारा प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक समय का चित्र।