क्या बाकई सब कुछ लॉकडाउन है ?-- शैलेंद्र श्रीमाल पत्रकार इंदौर

*क्या बाकई सब कुछ लॉकडाउन है ?*
नहीं
सूरज का निकलना लॉकडाउन नहीं है
मोहब्बतें लॉकडाउन नहीं हैं
प्यार लॉकडाउन नहीं है
फ़ैमली टाइम लॉकडाउन नहीं है
सीखना-सिखाना लॉकडाउन नहीं है
बातचीत लॉकडाउन नहीं हैं
कल्पनाएँ लॉकडाउन नहीं हैं
पढ़ाई लॉकडाउन नहीं है
रिश्ते लॉकडाउन नहीं हैं
आशाएँ लॉकडाउन नहीं हैं
परिंदों का चहकना लॉकडाउन नहीं है
किताबें लॉकडाउन नहीं हैं
क्रिएटिविटी लॉकडाउन नहीं है
पूजा- इबादतें लॉकडाउन नहीं हैं
नींदें लॉकडाउन नहीं हैं
उम्मीदें लॉकडाउन नहीं हैं
लॉक डाउन एक ख़ूबसूरत मौक़ा है जिसमें आप बाहर की दुनिया से तो नहीं मिल सकते लेकिन ख़ुद से तो मिल ही सकते हैं
इसलिए अपने आप को अनलॉक कीजिए.


और अंत में कुछ पंक्तियों के साथ विराम देना चाहूँगा -:
फिर हुआ ऐसा कि सब सुनसान हो गया
भीड़भाड़ वाला वो रास्ता वीरान हो गया
उड़ रहा वो परिंदा देख कर इस माहौल को
अपने ही शहर से जैसे अनजान हो गया
मर रहे हैं लोग लाखों की तादाद में
वक़्त भी इंसान के लिए हैवान हो गया
रो रहा है वो मज़दूर घर में बैठ कर
ख़त्म घर में खाने का सामान हो गया
लड़ने के लिए इस भयानक महामारी से
घर में क़ैद सारा संसार हो गया.


*✒️शैलेंद्र श्रीमाल पत्रकार इंदौर