पहले 'माफ करो महाराज' अब 'आप हमारे सरताज'

ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस पार्टी ने मध्य प्रदेश के गत विधानसभा चुनाव में प्रचार अभियान समिति का प्रमुख बनाया  था और उन्होंने पार्टी को जिताने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। आपको याद होगा उस चुनाव में बीजेपी ने अपना प्रचार अभियान शुरू किया था तो पार्टी ने नारा दिया था 'माफ करो महाराज हमारा नेता शिवराज' और इस नारे को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भाजपा ने करोड़ो रुपए खर्च किए थे। इस नारे के पीछे भाजपा का यह संदेश देना था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की छवि एक शाही और सामंतवादी नेता के रूप में है, वही उस वक्त के मुख्यमंत्री शिवराज को एक किसान के बेटे के तौर पर प्रचारित किया गया था। अपनी छवि को धूमिल करने के इस प्रचार के बावजूद सिंधिया ने कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रचार करने और उसे जिताने में पूरी ताकत झोंक दी थी। उन्हें  अपेक्षा थी, जब वक्त आएगा तो पार्टी उन्हें इस मेहनत का पूरा इनाम देगी। लेकिन  सिंधिया को अपने खून पसीने बहाने का कोई फल नहीं मिला और लगातार उनके प्रति उपेक्षा का भाव सभी स्तरों पर देखा गया। चाहे वह प्रदेश स्तर पर हो या हाईकमान स्तर पर हो। 


ऐसा नहीं है कि ज्योतिरादित्य ने अपनी नाराजगी को छुपाया हो बल्कि समय-समय पर अपनी नाराजगी का एहसास भी कांग्रेस हाईकमान और राज्य सरकार को कराया।  उन्होंने राज्य में अपनी पार्टी की सरकार को हमेशा किसी न किसी मुद्दे पर निशाना बनाया। इसकी शुरुआत उन्होंने अवैध खनन माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग को लेकर की। इसके बाद उन्होंने ट्विटर पर अपने बायो में से कांग्रेस का नाम हटा दिया। इससे भी बड़ी बात यह है कि सिंधिया ने जम्मू कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने का समर्थन किया । सिंधिया का यह स्टैंड उनकी अपनी पार्टी के स्टैंड के खिलाफ था।तब भी पार्टी ने इसे नजरअंदाज किया। सबसे ज्यादा उन्हें तकलीफ और अपमानित महसूस तब होना पड़ा जब कमलनाथ ने उनके एक बयान का जवाब देते हुए कहा कि 'उन्हें सड़क पर उतरना है तो उतर जाएं'। इस बयान से ऐसा लगता है कि उनके ईगो को चोट लगी। पार्टी के इस वरिष्ठ नेता, जो जन्मजात महाराजा के रूप में प्रतिष्ठित है, को ठेस लगना स्वाभाविक था। जाहिर है इस बयान से साफ संदेश गया कि कमलनाथ ज्योतिरादित्य सिंधिया की कोई परवाह नहीं करते। अगर हाल ही के घटनाक्रम की बात करें तब भी कमलनाथ ने यह कोशिश नहीं की कि इस संकट से उबारने के लिए ज्योतिरादित्य की मदद ली जाए।वे यह भूल गए कि ज्योतिरादित्य के पास कई विधायक हैं।  कमलनाथ अन्य दलों सहित निर्दलीय विधायकों को तो संभालने में लग गए लेकिन उन्हें अपनी ही पार्टी ऐसे वरिष्ठ नेता की परवाह करना उचित नहीं समझा जिसके जेब में 22 एमएलए रखे हुए थे और जो उसकी एक आवाज पर उसके लिए जान न्योछावर करने को तैयार बैठे थे।