*लिंगानुपात असंतुलन यह किसी एक घर का मामला नहीं है यह हम सभी का, देश का और विश्व का मामला है और हम सभी को मिलकर इसके संतुलन की ओर कार्य करना चाहिए – प्रो. आशा शुक्ला*


*लिंगानुपात असंतुलन को रोकने के लिए आपको ओर हमको साथ जोड़कर काम करने और समाज के नजरिए को बदलने की आवश्यकता है– डॉ. वीणा सिन्हा*

*आजादी के 70 साल बाद भी महिलाओं की स्थति में स्थाई सुधार नहीं देखने को मिलता- डॉ. सुप्रिया पाठक*

*महिलाओ के स्वास्थ, शिक्षा एवं आर्थिक सामाजिक स्तर के हर पहलू पर शोध करने की आवश्यकता है- डॉ. रत्ना मुले*

*बेटी पराया धन नहीं है यह बात समाज और परिवारों को समझने की आवश्यकता है – डॉ. अवन्तिका शुक्ला*

दिनांक 29-10-2023, भोपाल। आशा पारस फॉर पीस एंड हारमोनी फाउंडेशन एवं वेद फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रूप से राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय *लिंगानुपात असंतुलन : अधिकार, कानून और यथार्थ* विषय पर आयोजित किया गया । इसमे देश के अलग-अलग स्थानों के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों के प्रोफेसरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मीडिया प्रतिनिधियों एवं छात्र छात्राओं ने प्रतिभागिता की ।

मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. वीणा सिन्हा, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं प्रख्यात साहित्यकार, भोपाल द्वारा वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि लिंगानुपात असंतुलन एक विश्वव्यापी समस्या है इसके ऊपर अधिक कार्य करने की आवश्यकता है । उन्होंने Pre- Conception and Pre- Natal Diagnostic Techniques Act पर बात करते हुए समाज की जघन्य मानसिकता को बताते हुए कहा की जब बच्ची पैदा होती थी तो उसे परिवार के लोग तंबाकू मुँह में रखने, खटिया की नीचे दबाकर मार दिया जाता था । एक्ट के आने की बाद आज की स्थिति में सुधार हुआ है पर उतना नहीं जितना होना चाहिए था क्योंकि समाज की मानसिकता महिलाओं को स्वीकारने में अब भी पीछे है । आगे कहा की लिंगानुपात असंतुलन को रोकने के लिए हम सब को जुड़कर समाज का नजरिया बदलने की आवश्यकता है ।  

विशिष्ठ वक्ता के रूप में डॉ. अवन्तिका शुक्ला, स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा कहा कि समाज में बालिकाओं को हमेशा से नकार दिया गया है, हम सभी ने बहुत सुना होगा लड़कियों को पराया धन बताया है यह स्वम् उसके घर, परिवार बाले ही बोलते हैं। बेटी पराया धन नहीं हैं यह बात बेटों को परिवार और समाज को समझने की आवश्यकता है। इस बात को कहते हुए उन्होंने लिंगानुपात के आंकड़ों को भी विस्तार से प्रस्तुत किया।


विशिष्ठ वक्ता के रूप में डॉ. रत्ना मुले, चिकित्सक, महिला उद्यमी एवं मोटीबेशनल स्पीकर, भोपाल द्वारा अपने वक्तव्य में महिलाओं की भागीदारी के आंकड़ों, लिंगानुपात के आंकड़ों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा एवं आर्थिक सामाजिक स्तर के हर पहलू पर शोध करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा की हमे लड़कियों के साथ साथ लड़कों के व्यवहार और उनको संवेदनशील बनाने पर ध्यान देने कि आवश्यकता है। 

विशिष्ठ वक्ता के रूप में डॉ. सुप्रिया पाठक, स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा ने अपने वक्तव्य में महिलाओं की स्थिति को बताते हुए शारदा एक्ट, विधवा पुनर्विवाह, दलित स्त्रियों की चिंताजनक स्थिति पर जानकारी प्रदान की । उन्होंने कहा की आजादी के इतने साल बाद भी महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि समाज में दहेज के लालच में कई महिलाओं को जिंदा जला दिया जाता रहा है, बेटे की चाह में बच्चियों को मार दिया जाता रहा है। आज सभी देशों में महिलाओं की स्थिति बहुत चिंताजनक है यह चिंता का विषय है ।


अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. आशा शुक्ला, पूर्व कुलपति, डॉ. बी. आर. अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू द्वारा लिंगानुपात असंतुलन के परिणामों पर बात करते हुए कहा कि जीतने बेटे हैं उतनी बेटियाँ नहीं हैं और इसके कारण फाल्स मैरिज बड़ी हैं जिसमे महिलाओं का शोषण पूरा परिवार करता है। मानव तस्करी, बलात्कार जैसे अपराधों मैं इजाफा हुआ है इसका एक कारण है लिंगानुपात असंतुलन। उन्होंने कहा की पित्रसत्तात्मक व्यवस्था में बदलाव की बात करना वेमानी होगी । लिंगानुपात असंतुलन यह किसी एक घर का मामला नहीं है यह हम सभी का, देश का और विश्व का मामला है और हम सभी को मिलकर इसके संतुलन की ओर कार्य करना चाहिए। 

स्वागत एवं प्रस्तावना वक्तव्य डॉ. मनोज कुमार गुप्ता, संपादक, द एशिन थिंकर द्वारा प्रस्तुत किया गया। वेबिनार का संचालन एवं संयोजन प्रबंधक लव चावड़ीकर द्वारा किया गया। धन्यवाद डॉ. रामशंकर, मुख्य संपादक द एशियन थिंकर द्वारा प्रदत्त किया गया ।

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