मेहनत से बदला भाग्य और पाया मुकाम ... पिता वार्ड बॉय..., मां आयाबाई..., बेटा बना जनरल सर्जन .... 6 वर्ष की उम्र में मनावर बस स्टैंड पर कुल्फी बेचने वाला बालक आज डॉक्टर पिता की मौत हार्ट अटैक से हुई तो बन गया दिल का डॉक्टर.... आम बच्चे खिलौनों से खेलते थे और डॉक्टर सचिन को सर्जरी देखने में थी रूचि...

 *लोकेंद्रसिंह थनवार* 

 इंदौर। अपनी मेहनत से अपने भाग्य को बदलने का माद्दा जिस में होता है वही उस मुकाम पर पहुंचता है और लोगों के लिए प्रेरणादायक बन जाता है। पूरी शिद्दत से की गई मेहनत भाग्य को भी बदल देती है। खेलने के उम्र में मनावर के बस स्टैंड पर कुल्फी और मूंगफली बेची। बचपन से ही परेशानी का सामना करना पड़ा, लेकिन अपने सपने को हकीकत में बदल कर ही सांस ली। किसी फिल्मी कहानी है से कम रोचक नहीं है डॉक्टर सचिन शिंदे की हकीकत। वे आज सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल एम.वाय.एच. में कार्डियक सर्जरी में सीनियर रेसिडेंट के पद पर पदस्थ हैं।                       

आपको बता दें डॉक्टर सचिन शिंदे के पिता स्व. छोगालाल शिंदे उच्च शिक्षित होने के बावजूद मनावर स्थित कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में वार्ड बॉय के पद पर पदस्थ थे । उनकी मृत्यु के पश्चात 2005 में उनकी मां कावेरीबाई को अनुकंपा नियुक्ति मिली और वे आज भी आयाबाई के पद पर काम कर रही है। चार भाई-बहनों में डॉक्टर सचिन शिंदे का नजरिया कुछ अलग ही था उन्होंने अपने पिता की हार्ट अटैक से मौत के बात ही यह निश्चय कर लिया था कि मुझे डॉक्टर बनना है। हालांकि बचपन में पिता के साथ अस्पताल जाना और यहां डॉक्टरों के रुतबे ने उन्हें प्रभावित किया था। आम बच्चे खिलौने से खेलते है उस उम्र में सचिन को सर्जरी देखना पसंद थी। 



6 साल की उम्र में मनावर बस स्टैंड पर बेची कुल्फी 

 डॉ. सचिन शिंदे ने बताया कि पिता पर कर्ज था और कर्जदार घर पर आकर तकादे लगाते थे । पिता को कर्ज से परेशान होते देखकर सचिन शिंदे ने 6 साल की उम्र में मनावर बस स्टैंड और जाकर कुल्फी, पेप्सी, पानी के पाउच और मूंगफली बेचना शुरू कर दिया। सचिन की पहली कमाई थी 47 रुपए। एक-दो दिन तक घर वालों को इसका पता नहीं चला, लेकिन जब घरवालों के सामने सच्चाई आई तो सचिन की पिटाई भी हुई। कुल्फी बेचने के साथ उन्होंने प्लाटिक की खाली बॉटल बेचकर घर में मदद की तथा अपनी पढ़ाई का खर्चा भी निकला।

पिता लेकर आते थे टिफिन 

 पिता को कर्ज से उबारने के लिए उन्होंने कुल्फी और मंूगफली बेचना नहीं छोड़ा। आखिरकार पिता ने सचिन से वादा लिया की पढ़ाई प्रभावित नहीं करेगा। तब जाकर 6 साल का सचिन मनावर बस स्टैंड स्थित लाला पान सदन से कुल्फी ,पेप्सी लेकर बस स्टैंड पर बेचने लगा। सचिन के लिए पिता खुद टिफिन लेकर आते थे। उन्हें भी यही लगा था यह बच्चा है कुछ दिन बाद अपनी जिद छोड़ देगा। कई महिनों तक यही सिलसिला चलता रहा। इसके साथ पढ़ाई भी जारी रखी और मनावर के आदर्श विद्या मंदिर से अंग्रेजी माध्यम में पांचवी और आठवीं परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 

एम्बुलेंस में ही हो गई थी पिता की मौत

जब सचिन दसवीं कक्षा में थे तभी हार्ट अटैक से सरकारी अस्पताल मनावर परिसर में एंबुलेंस के अंदर ही उनके पिता की अटैक से मौत हो गई थी। पिता की मौत ने उन्हें डॉक्टर बनने के लिए प्रेरणा दी। डॉक्टर सचिन ने उस समय ही निर्णय लिया कि मैं किसी भी मरीज को ऐसे मरने नहीं दूंगा और डॉक्टर बनकर मानव सेवा करूंगा। उनके इस सपने को साकार करने में मनावर के डॉक्टर सक्सेना (सर्जन) ने प्रोत्साहित किया और मदद की। 

 नि:शुल्क कोचिंग से सपने हुए साकार  

 डॉ. सचिन का जुनून देखकर खरे कोचिंग क्लास इंदौर ने भी उनकी मदद की। दीपक खरे सर और मिलिंद खरे सर ने उन्हें निशुल्क कोचिंग देकर उनके सपने को साकार करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2011 में पीएमटी, आॅल इंडिया पीएमटी, आईसीएआर, वेटरनरी सभी परीक्षा में सिलेक्ट होने के बाद उन्होंने गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल मध्य प्रदेश को अध्ययन के लिए चुना। आॅल इंडिया पीएमटी से उन्हें इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज नागपुर मिला था, लेकिन मां की तबीयत को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एमपी पीएमटी से जीएमसी भोपाल को चुना और यहां से एमबीबीएस किया । 2019 में नीट पीजी में सिलेक्ट हुए और एमजीएम मेडिकल कॉलेज एम. वाय. अस्पताल इंदौर से मास्टर आॅफ सर्जन की डिग्री हासिल की। सर्जरी के बाद उनकी रुचि कार्डियक सर्जरी में इनोवेशन करने के लिए है, जिसमें वे विदेश में अध्ययन करने की रुचि रखते हैं। 

अस्पताल में भी करते है गरीबों की सेवा  

2 साल पहले डॉक्टर सचिन शिंदे के भाई अरविंद शिंदे की सड़क हादसे में जान चली गई थी । उनकी याद में डॉक्टर सचिन एम. वाय. अस्पताल में मरीजों की सेवा करते हैं। उनकी मानव सेवा से प्रभावित होकर इंदौर का सिख समाज उन्हें कई बार गुरुद्वारा में सम्मानित भी कर चुका है, जिस मरीज की सर्जरी होने होती है उसमें वे खुद ही मदद करते हैं और जिन मरीजों को मेडिकल की आवश्यकता होती है वे उन्हें मेडिकल विभाग में दाखिल करवाते हैं।  



   जीवन में आगे बढ़ने में इन लोगों ने की मदद

 सचिन शिंदे को कुल्फी बेचने से लेकर डॉक्टर बनने के सफर में जिन लोगों ने मदद की उनमें प्रमुख रुप से डॉ. शोभाराम पाटीदार, विशाल वर्मा, पांडे सर, गोविंद नारायण वर्मा , राजकुमार डावर, डॉ हिमांशु चोयल, वैद्य बाबूलाल पाटीदार, धीरज बालेश्वर ,डॉ. उदयन वाजपेई, डॉक्टर एमजी देवो, डॉ. अरविंद घनघोरिया, अबरार कुरैशी, प्रदीप भालके, डॉक्टर प्रबल रघुवंशी, डॉ.अशोक लड्ढा, कुशवाहा सर, भेरूलाल हम्मड़, डॉ. विनोद परमार, डॉ. रंजीत अहिरवार, डॉक्टर विकल्प तिवारी, डॉ.वीके पंडित, डॉ.कृपाशंकर तिवारी,पृथ्वीराज चौहान व डॉ.अभिजीत यादव शामिल हैं।

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