गाँव की सरकार चूने के लिए गाँव की जनता के बीच पहुच रहे उम्मीदवार~~ पंचायत चुनाव के शुरु हुई ग्रामीण क्षेत्रों में हलचल

 आशीष यादव धार

चुनाव का शौर शहर में जितना नही होता है, उससे ज्यादा चहल पहल ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देती है। शहर में चुनाव बस लोग जितने के लिए लड़ते है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव अपने वर्चस्व के लिए लड़ा जाता है। पांच साल में होने वाले चुनावों का गांव में बेसब्री से इंतजार किया जाता है। क्योंकि चुनाव गांवों में एक त्यौहार के रुप में होता है। जिसके लिए गांव जैसी छोटी जगहों पर भी लोग अपना वर्चस्व दिखाने में पिछे नही हटते है। गांवों में कांग्रेस व भाजपा पार्टियों का चुनाव चिन्ह तो उम्मीदवारों को नही मिलता है, लेकिन फिर भी गांवों में विधानसभा चुनाव जैसे उम्मीदवार खड़े होते है, जिसमें से कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार अलग होता है और भाजपा पार्टी का उम्मीदवार अलग होता है। इतना ही नही कुछ लोग निदर्लिय उतर कर भी अपना मैदान संभालते नजर आते है। वही कोई गांव में भी लोगों को पंचायत चुनाव होने पर उत्साह रहता है वह अपना प्रत्याशी बनाने की जोड़-तोड़ से कोशिश होती है


चुनाव के लिए तय हो गए उम्मीदवार

पंचायत चुनाव नजदिक आने से पहले ही गाव में प्रत्याशी तय हो गए अब गाव में उम्मीदवार अपना प्रचार जोर शोर से कर रहे हैं सुबह उठकर शाम तक प्रचार करते हुए नजर आ रहेहै वही गाव में कोनसा उम्मीदवार अच्छा होगा। यह बात चाय की दुकान व चौपालों पर बाते करते लोगो से पता चल रही है वही गाँव मे अलग-अलग गुटो ने अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए भी तैयारियां शुरु कर दी है। यह भी तय हो चुका है कि इसे कैसे हराना है। 


युवा वर्ग भी ले रहा दिलचस्पी 

आजकल पंचायत चुनाव में अधिकांश गावों में युवा वर्ग अपने अलग ही पहचान बनाने लगा है। तो फिर भी वह गांव में क्यों नही आएगा गांवों में युवा उम्मीदवार भी इस बार चुनाव में अपनी युवा वर्ग को आकर्षित करने में लगे है। क्योंकि युवा वर्ग में भी राजनिती का अलग ही जोश होता है। इसके लिए गाँवो में युवा टोली बनाकर विकाश को लेकर भी बाते करते है। वहीं कहीं पचायतों में अनुभवी सरपंच भी मैदान में है क्योंकि उनका अनुभव उनके साथ है और गांव में किए गए विकास भी लोगों को दिख रहे हैं


हर गांव में होता है एक मास्टरमाइंड 

सभी गांव में एक मास्टरमाइंड होता है जिसे पता होता है कि चुनाव में जीत कैसे होती है। उन्हें ग्रामीण राजनितीक वैज्ञानिक भी कहा जाता है। जिन्हें लंबे समय का चुनावी अनुभव होता है। और सभी उम्मीदवार उनके पास जाकर उनके द्वारा दिए जाने वाले आइडिया को अपनाते है और जीत भी जाते है कहीं लोग इसे राजनीतिक आका या गुरु भी कहते हैं जो उनके लिए चुनाव में मेहनत भी करते हैं


वर्चस्व की होती है लड़ाई

सरपंच का चुनाव एक ऐसा चुनाव है जहां सामान्य ओबीसी एसटी एससी व अन्य वर्गों में वर्चस्व की लड़ाई के लिए चुनाव लड़ा जाता है इसमें यह सबसे छोटा चुनाव रहता है मगर वर्चस्व के तौर पर यह सबसे बड़ा चुनाव होता है इस चुनाव में कहीं जगह विवाद भी होते हैं वही क्षेत्रों में वर्चस्व की लड़ाई होती है, वहां जब दो मजबूत गुट आमने सामने होते है तो टक्कर भी करारी हो जाती है। व अपना वर्चस्व जमाने के लिए लाखों रुपए तक खर्च कर दिए जाते है। 


चुनाव के बाद बढ जाती है लड़ाईया

पंचायत चुनाव के बाद यह चुनाव लड़ाई के रूप भी देता है क्योंकि हार जीत के कारण प्रत्याशी आमने-सामने लड़ाई झगड़े पर उतारू हो जाते हैं पंचायत चुनाव तो गांव में पांच साल में एक बार होता है, लेकिन उम्मीदारों की आपसी लड़ाईया अगले सालों तक चलती है। कई बार गांवों में चुनाव हारने से नाराज उम्मीदार आपस में ही भीड़ जाते है। लड़ाई के चलते खून खराबे तक बात चली जाती है



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