प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के गैर जिम्मेदाराना बर्ताव से कोरोना का हो रहा है पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में विस्फोट

 कोरोना ने मध्य प्रदेश के बाकी हिस्सों में अपनी रफ्तार कैसी रखी है, इसका पता तो हमें अक्सर खबरों में चलता रहता है लेकिन पीथमपुर में कोरोना की क्या स्थिति है, इसके बारे में ना तो स्थानीय प्रशासन को, ना ही स्वास्थ विभाग को कोई जानकारी मिल पाती है और इसका मुख्य कारण है दोनों ही विभागों के स्थानीय अधिकारियों द्वारा स्थिति को देखते हुए सही बर्ताव ना करना और ना ही उस दिशा में उचित कदम उठाना. 



आज अगर कोई पीथमपुर के रहवासी क्षेत्र या बाजार से निकले तो वह पाएगा कि ना तो लोग यहां चेहरे पर मास्क लगा रहे हैं, ना ही उचित दूरी का पालन कर रहे हैं. किसी तरह का डर लोगों में नहीं दिख रहा है और यही कारण है कि यह बीमारी लगातार दिन-दूनी, रात-चौगुनी गति से पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में अपने पैर पसार रही है. 

अगर इस स्थिति के लिए हम सिर्फ प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को जिम्मेदार ठहराया तो वह भी गलत होगा क्योंकि बड़े बड़े उद्योग स्थापित करने वाली कंपनियां भी कम लापरवाही नहीं बरत रही हैं. एसआरएफ कंपनी के 12 लोग अभी तक कोरोना संक्रमित हो चुके हैं और इसी तरह से फ्लेक्सीटॉप कंपनी के सीईओ पॉजिटिव हो चुके हैं. बावजूद इसके, उन सारे लोगों की कांटेक्ट हिस्ट्री के बारे में ना तो कंपनी ने, ना ही प्रशासन ने और ना ही स्वास्थ्य विभाग ने कोई पता लगाया. बस उन्हें अपने अपन घरों में बिना किसी को बताए क्वॉरेंटाइन कर दिया. उक्त कंपनियां अपनी कंपनी में पाए जाने वाले कोरोना मरीजों को किराए पर ली हुई गाड़ियों में अस्पतालों तक पहुंचाते हैं जिससे यह भी खतरा है कि वह किराए की गाड़ी का ड्राइवर और उस में बैठने वाले अन्य लोगों को भी संक्रमण हो सकता है और वह भी चपेट में आ सकते हैं.

एक और बात यह है कि अगर कोई एक व्यक्ति जो कि कर्मचारी स्तर का है वह कोरोना से संक्रमित होता है तो उसके साथ काम करने वाले कम से कम 40 लोगों पर संक्रमण का खतरा है. अगर उसी कंपनी के किसी शीर्ष अधिकारी को कोरोना संक्रमण हो जाए तो उस स्थिति में उससे जुड़े हुए सैकड़ों लोग हो सकते हैं जो उसके साथ संपर्क में आए हो और जिन्हें संक्रमण का खतरा है.

महाराष्ट्र से माल आता है और यहां से महाराष्ट्र माल जाता भी है जिसके लिए वो ट्रक जो महाराष्ट्र और पीथमपुर के बीच में चलते हैं, लगातार अपनी सेवाएं देते रहते हैं.  यह भी बहुत बड़ा प्रश्न है जब स्वास्थ्य विभाग को, प्रशासन को, साथ ही कंपनी प्रबंधन को मालूम है कि महाराष्ट्र में कोरोना की स्थिति बेहद नाजुक है तो वहां से आने वाली ड्राइवरों और अन्य स्टाफ के बारे में सावधानी क्यों नहीं बरती जा रही है.

बात अगर स्वास्थ्य विभाग के बीएमओ की की जाए या फिर सीएमएचओ की की जाए तो एक बात पता चली है कि यह अधिकारी भी अपने ऊपर दिए जाने वाले डाटा में गलत फिगर दे रहे हैं जिसस सही वस्तुस्थिति प्रदेश की सरकार या फिर शीर्ष पर बैठे लोगों तक नहीं पहुंच रही है.

एक और सरकार कोरोना की वैक्सीन लगाने को लेकर बेहद संजीदा है और हर तरह के उपाय सरकार द्वारा केंद्रीय और राज्य के स्तर पर किए जा रहे हैं पर अगर वैक्सीनेशन के संबंध में पीथमपुर को देखा जाए तो यहां का स्टाफ बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रहा है कि वैक्सीनेशन का आंकड़ा बड़े. अगर मौजूदा तरीके से वैक्सीनेशन होता है तो संपूर्ण पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र को वैक्सीनेशन देने में लगभग 2 वर्षों का समय लगेगा, ऐसा लोगों द्वारा किए गए सर्वे में निकल कर आया है.

लोगों का यह भी मानना है कि जब सरकारी डॉक्टर वैक्सीनेशन के बारे में अपनी ड्यूटी ढंग से नहीं कर रहे हैं तो प्राइवेट अस्पतालों को क्यों ना यह जिम्मेदारी दी जाए जैसा कि इंदौर और अन्य स्थानों पर हो रहा है. इंदौर में अब तक 21 अस्पतालों को वैक्सीनेशन का सेंटर बनाया गया है और सरकार से उन्हें पूरी-पूरी सहायता मिल रही है. इसका मुख्य उद्देश्य शायद यही रहा होगा कि जल्दी से जल्दी अधिक से अधिक वैक्सीनेशन हो पाए. बात अगर पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र की की जाए तो यहां पर सिर्फ एक ही सेंटर है वह भी सरकारी अस्पताल में. सरकारी अस्पताल का रवैया बेहद ढीला और लचर है जिस कारण से गिने चुने लोग दिनभर में यहां पर वैक्सीन लगवा पाते हैं. 

अस्पताल के ही सूत्रों से पता चला कि पीथमपुर के औद्योगिक क्षेत्र में स्थित सरकारी अस्पताल में वैक्सीन की बर्बादी भी बहुत हो रही है क्योंकि एक वाइल में से 10 लोगों को वैक्सीन लगनी होती है और अक्सर ऐसा हो रहा है कि उस निश्चित समय में वह वाइल खत्म नहीं हो पाती है जिस कारण से हर व्हाईल में से तीन या चार लोगों की वैक्सीन बर्बाद हो रही है.