अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते एक और मरीज की हुई एंबुलेंस में मौत

जब से कोरोना महामारी का कहर शुरू हुआ है तब से ही कई मरीजों की एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल, दूसरे अस्पताल से तीसरे अस्पताल और अस्पतालों के चक्कर काटते समय एंबुलेंस में ही मौत हो चुकी है. अगर इस तरह की मौतों का आंकड़ा देखा जाए तो इंदौर-धार जिले को मिलाकर 50 के करीब पहुंच चुका है और इनमें से अधिकतर मामले पीथमपुर और छोटी जगहों के हैं जहां अस्पतालों में जीवन रक्षण की पर्याप्त सुविधाएं नहीं होने के कारण वहां के डॉक्टर ऐसे मरीजों को इंदौर रेफर कर देते हैं और इंदौर में शुरू हो जाता है एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजने का सिलसिला.


 ताजा घटना पीथमपुर के विश्वास नगर कॉलोनी निवासी 35 वर्षीय सुरेंद्र पिता शिव नाथ के साथ हुई जिसे उसके परिजन लेकर आज सुबह पीतमपुर के संजीवनी अस्पताल पहुंचे. वहां पर डॉक्टर दिनेश राठौर जो ड्यूटी पर थे, ने उनकी जांच की तो पाया कि सुरेंद्र के पेट में बहुत तेज दर्द था, साथ ही उसका सैचुरेशन लेवल भी काफी कम था. डॉ राठौर के अनुसार ऐसे मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत होती है और यही सोच कर उन्होंने उसे इंदौर रेफर कर दिया.


मरीज को एक प्राइवेट अस्पताल की एंबुलेंस लेकर इंदौर गई और मरीज के परिजनों की इच्छा के अनुसार वे लोग अरविंदो अस्पताल पहुंचे. यहां पर जब परिजन ने अस्पताल प्रबंधन को उनके मरीज की जांच करने के लिए कहा तो कथित रूप से वहां के ड्यूटी डॉक्टर ने एंबुलेंस तक आना भी जरूरी नहीं समझा और यह कहकर मना कर दिया कि उस अस्पताल में सिर्फ कोरोना के पेशेंट्स ही लिए जा रहे हैं.


इस पर परिजन उसे लेकर इंदौर के यूनिक अस्पताल पहुंचे और यूनिक अस्पताल के बाहर एंबुलेंस खड़ी करके अंदर संपर्क किया तो यूनिक अस्पताल के डॉक्टर ने सुरेंद्र को देखा और उसे मृत घोषित कर दिया.


इस सारे चक्कर में लगभग मरीज के 3 घंटे से ज्यादा समय व्यतीत हो गए जो ऐसे मरीजों के इलाज के लिए बेहद अहम समय होता है.


खैर परिजन शव को लेकर वापस पीथमपुर पहुंचे और उसके दाह संस्कार की तैयारी करने लगे.


इस मुद्दे को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझते हुए जियान न्यूज़ अखबार यह बात उठाता है कि सुरेंद्र की मौत सिर्फ बीमारी से नहीं बल्कि अस्पतालों की लापरवाही से भी हुई और, अरविंदो अस्पताल भले ही उसको एडमिट ना करता पर उसे चेकअप करके अगर कोई जीवन रक्षक दवाइयां दे दी जाती तो अगले अस्पताल तक पहुंचने तक उसकी सांस सांसे चलती रहती पर ऐसा नहीं हुआ.


एक और बात जो यहां देखने वाली है पर जिसकी पुष्टि नहीं की जा सकी है कि परिजन को भी इतनी दूर अरविंदो अस्पताल ले जाने के बजाय पास के किसी अस्पताल में ले जाना था तो समय की भी बचत होती और मरीज को जल्दी इलाज मिल पाता.


कारण क्या रहा और गलती किसकी है यह एक अलग बात है पर एक जवान आदमी की जान चली गई, यह शाश्वत सत्य है. इसलिए मेडिकल फील्ड में कार्यरत सारे लोग और मेडिकल विभाग को इस बारे में स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने चाहिए कि पीथमपुर या उस जैसे छोटे कस्बों से जो मरीज आते हैं, उनको तुरंत इलाज मिल सके, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए. 


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