कोरोना से दूर भागो,  अपनों से नहीं- प्रो दीपक कुमार वर्मा निदेशक, ब्राउस

कोरोना से दूर जाए अपनों से नहीं कहा प्रोफेसर डीके वर्मा ने


कोरोना वाइरस संक्रमण को रोकने के लिए सोशल डिसटेंसिंग ज़रूरी है ।लेकिन इसका यह मतलब क़तई नहीं है कि कोरोना वाइरस की महामारी के डर से हम अपने परिवार के सदस्यों विशेषकर बुजुर्गों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से ही डिसटेंसिंग कर लें। 


यह और भी भयावह है कि कोरोना वाइरस से संक्रमित हो जाने के डर से लोग अपने माता पिता का अंतिम संस्कार करने से भी डिसटेंसिंग कर लें। 


हाल ही में प्रदेश के शुजालपुर के एक निवासी की कोरोना वाइरस के संक्रमण से हुई मौत ना केवल दिल दहलाने वाली घटना है, अपितु हमारी सामाजिक और पारिवारिक परम्परागत व्यवस्था एवं संस्कारों के लिये भी चिंताजनक है। 


भोपाल के समीप बैरागढ़ के तहसीलदार श्री गुलाब सिंह बघेल ने एक न्यूज़ चैनल को बताया कि दिनांक २० अप्रैल २०२० को शुजालपुर निवासी श्री प्रेमसिंह मेवडा की कोरोना वाइरस से संक्रमित हो जाने से अस्पताल में मृत्यु हो गई। दो दिनों तक उनका शव अस्पताल के शव-गृह में ही पड़ा रहा । 


जब उनके परिवार से सम्पर्क कर इसकी जानकारी दी गई तो परिवार के सदस्यों ने उनके अपने ही श्री प्रेमसिंह का मृत शरीर ले जाने से ही इंकार कर दिया। 


हालाँकि प्रशासन ने कोरोना वाइरस की सभी प्रोटोकाल का पालन कर और शव के कोरोना वाइरस से दूसरों को संक्रमित होने से रोकने की पूर्ण सुरक्षा कर दिए जाने की  जानकारी देते हुए परिवार को सुरक्षित रूप से अंतिम दाह संस्कार होने का आश्वासन दिये जाने के बावजूद परिवार ने शव लेने से इंकार कर दिया। 


प्रशासन द्वारा परिवार को सुरक्षा कवच, सेनिटाईज़र, दस्ताने उपलब्ध कराने के बाद भी मृतक के बेटे संदीप ने कोरोना वाइरस से संक्रमित पिता की मृत्यु हो जाने और कोरोना वाइरस से स्वयं भी संक्रमित हो जाने की आशंका व डर के चलते अपने ही पिता का अंतिम संस्कार करने से ही मना कर दिया ।


परिवार के सदस्यों को प्रशासन द्वारा सभी तरह से कोरोना वाइरस से सुरक्षित करने के प्रयासों की जानकारी और आश्वासन देने के बाद भी जब परिवार ने मृत प्रेम सिंह मेवाड़ का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया तो बैरागढ़ के तहसीलदार श्री गुलाब सिंह बघेल ने मानवता दर्शाते हुए मृतक का अंतिम संस्कार किया । जो सराहनीय और स्तुति योग्य है। साधुवाद।


कोरोना वाइरस के संक्रमण को रोकने में सोश्यल डिसटेंसिंग का पालन किया जाना अनिवार्य है, पर सामाजिक दूरी रखने का यह अर्थ तो बिल्कुल भी नहीं है कि हम अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों से भी दूरी बना लें। 


कोरोना वाइरस के संक्रमण से बचने और रोकने के लिए भौतिक दूरी ज़रूरी है, परिवार व घर के बाहर जाने से बचना है, ऐसे सामाजिक कार्यों को टालना है जिसमें लोग इकट्ठा हों। 


लेकिन कोरोना वाइरस के डर से अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारी से ही मुँह मोड़ लेना और यहाँ तक कि अपने ही पिता का अंतिम संस्कार करने से ही मना कर देना सोशल डिसटेंसिंग नहीं पारिवारिक अवमूल्यन है सामाजिक विघटन है। 


यह घटना समाजशास्त्रियों हेतु, समाज वैज्ञानिकों के लिये चिंतन शोध का विषय है ।


हमें तत्काल प्रयास करने होंगे कि ऐसी घटना फिर कहीं और नहीं हो।


यह भी विचारणीय है कि सोशल डिसटेंसिंग के स्थान पर क्या कोरोना संक्रमण से भौतिक दूरी कहा जाना ज़्यादा उचित होगा। 


मैंने इस सम्बंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक तेद्रोस अधनोम घेबरेएसस को ११ मार्च २०२० एवं माननीय प्रधानमंत्री जी के कार्यालय तथा राष्ट्रीय व राज्य स्तर के सभी प्रमुख कार्यालयों में दिनांक १२ मार्च २०२०  को पत्र लिखा था कि सोशल डिसटेंसिंग का अन्यथा अर्थ सामान्य जन निकाल सकते हैं, अतः कोरोना वाइरस महामारी के संक्रमण को रोकने हेतु सोशल डिसटेंसिंग के स्थान पर फ़िज़िकल या सरवाइवल डिसटेंसिंग कहा जाये।


केवल एक घटना से पूरे समाज के लिए सामान्यीकरण उचित नहीं होता, किंतु समाज में घटित  मात्र किसी एक घटना को नगण्य मानकर नज़रंदाज़ कर देना  समाज विज्ञान की दृष्टि से उचित नहीं होगा क्योंकि  समाज विज्ञान का महत्वपूर्ण उपागम नैसर्गिकऔर केस स्टडी आधारित गुणात्मक शोध ही है। 


अतः हमें सचेत होकर समाज में सही जागरूकता विशेषकर कोरोना वाइरस के संक्रमण को फैलने से रोकने  हेतु प्रयास करना होगा  जिससे पारिवारिक  और सामाजिक व्यवहार तथा संस्कारों पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़े एवं अवमूल्यन ना हो।