अर्णब गोस्वामी से ज्यादा  कड़े प्रहार तो प्रणब मुखर्जी,  मुलायम सिंह यादव  शरद पवार,पी ए संगमा  और तारिक अनवर ने किए थे- पत्रकार मिलिंद मजूमदार

# लिख दिया सो लिख दिया


अर्णब गोस्वामी से ज्यादा 
कड़े प्रहार तो प्रणब मुखर्जी, 
मुलायम सिंह यादव
 शरद पवार,पी ए संगमा 
और तारिक अनवर ने किए थे...


मित्रों,16 अप्रैल को महाराष्ट्र के पालघर क्षेत्र में जूना अखाड़े के स्वामी सुशीलानंद गिरी,उनके साथी साधु तथा कार ड्राइवर की मॉब लिंचिंग में अत्यंत नृशंस तरीके से हत्या कर दी गई थी। इस इस घटना से सारे देश में आक्रोश की लहर फैल गई थी। रिपब्लिक न्यूज नेटवर्क के सर्वेसर्वा अर्णब गोस्वामी ने इस घृणित और अत्यंत निंदनीय कृत्य के खिलाफ अपने चैनल पर अभियान चलाया। यह ध्यान रखना होगा कि,पालघर वो इलाका है जहां पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व है। यहां आदिवासियों में क्रिप्टो क्रिश्चियन की तादाद काफी है। राम जन्मभूमि के समय भी इस क्षेत्र में अनेक बार ऐसी घटनाएं हुई है। नाचीज के महू क्षेत्र में भी खुर्दा के ऐतिहासिक चर्च के प्रभाव वाले इलाके में 1995 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन के विस्तारक धर्मेंद्र गौड़ की चोटी काटने की घटना हुई थी। श्री गौड़ वहां धर्म जागरण का कार्य संघ के माध्यम से कर रहे थे। गुजरात के डांग, पंचमहाल, दाहोद, महाराष्ट्र के धुले, नंदुरबार, शाहदा, मध्यप्रदेश के अलीराजपुर,झाबुआ, रतलाम, खंडवा,खरगोन बड़वानी और धार राजस्थान के बांसवाड़ा जिलों की कम से कम 13 लोकसभा सीटों पर डेढ़ करोड़ से अधिक आदिवासी जनसंख्या निवास करती है। इन सभी क्षेत्रों में अंग्रेजों के समय से ही चर्च की प्रेरणा से बड़े पैमाने पर धर्मांतरण होता रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आर्य समाज, दिगंबर और श्वेतांबर जैन समाज यहां तक कि,समाजवादी चिंतक मामा बालेश्वर दयाल जैसे नेताओं ने जब भी जागरण अभियान चलाया  तो चर्च की शह पर हमले होते रहे हैं। 1952 से 1989 यानी पहले 8 लोकसभा चुनाव तक कमोबेश इन सभी लोकसभा सीटों पर कांग्रेस का एक तरफा वर्चस्व रहा है। यह भी ट्रेंड है कि देश के अन्य राज्यों के आदिवासी क्षेत्रों में लगभग ढाई सौ से अधिक वर्षों से चर्च ने जहां भी हिंदू विरोधी जमीन तैयार की, वहां साम्यवादी दलों ने अपने वैचारिक बीज बोए और हिंदू विरोध को और निर्मम बनाया। बहरहाल, अब आते हैं मूल विषय पर, अर्णब गोस्वामी ने कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के इटली के कनेक्शन  को जोड़ते हुए उनसे (सोनियाजी से)अपनी खास आक्रमक शैली में सवाल किया कि वह पालघर में दो साधुओं की हुई हत्या पर चुप क्यों हैं। अर्णव गोस्वामी की अपनी शैली है,वह सही है या गलत इस पर विवाद हो सकता है लेकिन उनके चैनल पर उठाए गए तथ्यों पर नहीं। हकीकत तो यह है कि,जो सवाल अर्णव गोस्वामी ने उठाए लगभग वैसे ही प्रश्न देश के सबसे बड़े नेहरू वादी नेता भारत रत्न पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने उठाए थे।पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने खुलासा किया था कि सोनिया गांधी ने जानबूझकर हिंदुओं को नीचा दिखाने के लिए शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को गिरफ्तार करवाया था।  गौरतलब है कि नवंबर 2004 में कांग्रेस के सत्ता में आने के कुछ महीनों के भीतर ही दिवाली के मौके पर शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को हत्या के एक केस में गिरफ्तार करवाया गया था। जिस वक्त गिरफ्तारी की गई थी, तब वो 2500 साल से चली आ रही त्रिकाल पूजा की तैयारी कर रहे थे। गिरफ्तारी के बाद उन पर अश्लील सीडी देखने और छेड़खानी जैसे घिनौने आरोप भी लगाए गए थे। प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब ‘द कोएलिशन इयर्स 1996-2012’ में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा, ”मैं इस गिरफ्तारी से बहुत नाराज था और कैबिनेट की बैठक में मैंने इस मसले को उठाया भी था। मैंने सवाल पूछा कि क्या देश में धर्मनिरपेक्षता का पैमाना सिर्फ हिंदू संत-महात्माओं तक ही सीमित है? क्या किसी राज्य की पुलिस किसी मुस्लिम मौलवी को ईद के मौके पर गिरफ्तार करने की हिम्मत दिखा सकती है?” यह वाक्य हैं पूर्व महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के।


- 1999 में कांग्रेस के तीन तत्कालीन वरिष्ठ सांसद स्वर्गीय पुर्णो ए संगमा, श्री शरद पवार और श्री तारिक अनवर ने राष्ट्रवादी कांग्रेस का गठन करने के तत्काल बाद यही सवाल उठाए थे। इनमें से श्री अनवर राष्ट्रवादी कांग्रेस से राज्यसभा सदस्य रहने के बाद एक साल पूर्व वापस कांग्रेस में लौट आए हैं। जबकि श्री पवार, डॉ मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में लगातार 10 साल केंद्रीय मंत्री रहे हैं। अभी भी महाराष्ट्र में कांग्रेस श्री शरद पवार की गोद में बैठकर ही सत्ता का स्वाद चख रही हैं। दरअसल,राष्ट्रवादी कांग्रेस का गठन ही श्रीमती सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर हुआ था। उस समय स्वर्गीय पी ए संगमा ने श्रीमती गांधी पर अनेक ऐसे कड़े प्रहार किए थे जिनके समक्ष श्री अर्णव गोस्वामी के प्रहार कुछ भी नहीं है। पीए संगमा और तारिक अनवर ने एक पत्रकार वार्ता लेकर श्रीमती सोनिया गांधी से यह सवाल पूछा था कि उन्होंने 1968 में स्वर्गीय राजीव गांधी से विवाह किया। यानी वे 1968 से भारत की बहू हैं और उन्हें उसी के अनुरूप पूरा सम्मान मिल रहा है, लेकिन श्रीमती सोनिया गांधी ने 1983 तक भारत की नागरिकता क्यों नहीं ली थी। यानी श्रीमती सोनिया गांधी जिनकी भारत के प्रति निष्ठा पर कोई संदेह नहीं है,जो इस देश की लगातार पांच बार से सम्मानित सांसद हैं। उन्होंने 15 वर्ष तक भारत की नागरिकता लेना तक  उचित नहीं समझा। कांग्रेस आज तक स्वर्गीय संगमा के उस सवाल का जवाब नहीं दे पाई है।
- यह ध्यान रखना होगा की 2000 में रोमन कैथोलिक चर्च के तत्कालीन प्रमुख पोप जॉन पॉल द्वितीय भारत आए थे। नई दिल्ली की सर्वधर्म सभा में उनका वक्तव्य  था कि, रोमन कैथोलिक चर्च ने पहली सहस्राब्दी यानी पहले 1000 वर्ष में यूरोप को ईसाई बनाया। दूसरी शताब्दी यानी इसके बाद के 1000 सालों में अफ्रीका को ईसाइयत के झंडे तले लाया गया। तीसरी सहस्राब्दी यानी सन् 2000 के बाद के 1000 वर्षों तक समूचे एशिया को ईसाई बनाने का कैथोलिक चर्च का लक्ष है। इसलिए इस सहस्राब्दी के पहले 100 वर्षों में भारत को सुपीरियर बनाना यानी ईसाई बनाना है। ध्यान रहे कैथोलिक चर्च जब धर्मांतरण करता है तो यह दावा करता है कि वह इंसानियत को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा रहा है यानी इनफीरियर हिंदू या अन्य गैर कैथोलिक मनुष्य को सुपीरियर बना रहा है। जिस देश की संस्कृति और सभ्यता वेद कालीन है, वहां पर चर्च धर्मांतरण करते समय यह दावा करता है कि ईसाई बनना यानी सुपीरियर बनना है। सनद रहे ईसा मसीह से दुनिया का कोई विवाद नहीं है। वे निश्चित रूप से देवदूत हैं। उन्होंने दुनिया को सेवा और क्षमा का पाठ पढ़ाया, लेकिन चर्च की गतिविधियां साम्राज्यवादी होती हैं। चर्च मानता है कि ईसा को तभी प्राप्त किया जा सकता है जब कोई व्यक्ति चर्च की सदस्यता लें। कैथोलिक चर्च इतना कट्टर है कि, वह अन्य चर्चों की प्रार्थना को भी ईसाइयत नहीं मानता। इसके लिए रोमन साम्राज्य, क्रुसेड और यूरोप का इतिहास पढ़ें। महात्मा गांधी और डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी चर्च की गतिविधियों पर अनेक बार लिखा है। स्वामी विवेकानंद ने भी अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान इसका उल्लेख किया था। विषयांतर को समाप्त करते हुए नाचीज मूल विषय पर आता है।मूल विषय पर आता है कि, पोप जॉन पॉल द्वितीय की सन 2000 में दिल्ली में हुई वह सर्व धर्म सभा तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत की सदारत में हुई थी। जब पोप महोदय के बयान की आलोचना होने लगी तो कांग्रेस ने बजाएं पोप के घोर सांप्रदायिक बयान की आलोचना करने के, पोप के आलोचकों को ही संकीर्ण, नफरत से भरा और देश को तोड़ने वाला बताकर अपना पुराना बयान दोहराया। सनद रहे अमर शहीद महान राजीव गांधी की दर्दनाक हत्या करने वाले लिट्टे के तमिलनाडु जेल में बंद आरोपियों को श्रीमती सोनिया गांधी और उनके परिवार ने क्षमा करते हुए तमिलनाडु और केंद्र सरकार से कहा कि वह उन्हें रिहा करवाएं। ऐसा करके श्रीमती सोनिया गांधी कैथोलिक चर्च की महानता का बखान करते हुए तमिलनाडु,केरल, कर्नाटक,अविभाजित आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र और झारखंड में कैथोलिक चर्च के धर्मांतरण को नैतिक आधार प्रदान करना चाहती थीं। उनकी स्वर्गीय गांधी के हत्यारों को माफी देने की आलोचना तमिलनाडु के कांग्रेसियों ने ही की थी। इनमें स्वर्गीय जीके मूपनार, श्रीमती जयंती नटराजनऔर उनके समर्थक भी शामिल थे। सनद रहे श्रीमती सोनिया गांधी और उनका परिवार स्वर्गीय राजीव गांधी के हत्यारों को माफ कर के लिए तैयार था, लेकिन सिख नरसंहार के लिए आज तक माफी मांगने को तैयार नहीं है।


- 1998 में जब स्वर्गीय अर्जुन सिंह की सलाह पर श्रीमती सोनिया गांधी कांग्रेस और सहयोगी दलों का समर्थन पत्र तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने गई तो डॉक्टर कलाम ने उन्हें लौटा दिया। डॉ कलाम ने क्यों लौट आया इस पर कभी भी अधिकृत रूप से कभी कुछ नहीं कहा गया, लेकिन जैसा कि मीडिया में बार-बार आया, मूल कारण यह था कि इटली में जन्मे व्यक्ति की नागरिकता आजीवन इटली की रहती है। यानी जब श्रीमती सोनिया गांधी ने उनके पास बहुमत का दावा किया तब वह भारत और इटली दो देशों की नागरिक थीं (आज भी हैं)। तब मीडिया में आई खबरों के अनुसार, राष्ट्रपति के सैन्य सचिव जो तब मेजर जनरल रैंक के अधिकारी होते थे (अब वे लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारी होते हैं) ने राष्ट्रपति से यह कहा कि, सेना की इंटेलिजेंस एजेंसी सभी प्रमुख विदेशी पत्नियों को सर्विलांस पर रखेंगी, तो राष्ट्रपति स्वर्गीय कलाम ने यह जानकारी श्रीमती सोनिया गांधी को दी, इसके बाद ही श्रीमती गांधी ने प्रधानमंत्री पद का मोह छोड़ा जिसे त्याग का नाम दिया गया। सनद रहे भारतीय संविधान में राष्ट्रपति सेना के सुप्रीम कमांडर होते हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि विदेशी मूल के मुद्दे पर ही श्री मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस को समर्थन देने से मना किया था। यानी श्रीमती सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा संघ परिवार से अधिक प्रभावी ढंग से कांग्रेस और समाजवादियों ने उठाया है। ऐसे में अर्णब गोस्वामी को निशाने पर रखना नाचीज गलत मानता है। यह सही है कि श्रीमती सोनिया गांधी का व्यक्तित्व गरिमामय हैं। कैथोलिक चर्च ने उनके कांग्रेस अध्यक्ष होने का नाजायज लाभ उठाने की कोशिश की, लेकिन देश की जनता ने उन्हें अपनी बहू ही माना है। यही वजह है कि सोनिया जी रायबरेली से कभी चुनाव नहीं हारीं। यह भी ध्यान रखना होगा कि संघ परिवार के दो सबसे महान नेता स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने ने कभी भी श्रीमती सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा नहीं उठाया। बहरहाल, नाचीज का यही मानना है कि श्री अर्णव गोस्वामी ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिसे श्री प्रणब मुखर्जी, स्वर्गीय जीके मूपनार, श्री मुलायम सिंह यादव, श्री शंकर सिंह वाघेला, श्री शरद पवार, स्वर्गीय पी ए संगमा और तारिक अनवर ने नहीं उठाया हो। इसलिए मेरा पूर्ण समर्थन श्री अर्णव गोस्वामी को है। मैं उनको प्रताड़ित करने वालों की घोर निंदा करता हूं और निवेदन करता हूं कि वे अपनी बात तथ्यों के आधार पर करें।


 - मेरी व्हाट्सएप पोस्ट से..
 लोककांत महूकर
 बकलम- मिलिंद मुजुमदार
(9754792524
24/4/2020)