ऐसे बर्बाद हुआ सबसे उन्नत शहर (Calcutta) कोलकाता

 


यदि अर्थव्यवस्था की बात की जाए तो 1966 तक तो कोलकाता हर मामले में मुंबई से आगे था। यह विश्व के 10 सबसे अच्छे शहरों में शामिल था।

लेकिन 1967 में पहली बार था जब कांग्रेस जीत तो गयी लेकिन 14 सीटो से बहुमत नही पा सकी। सारे विरोधियों ने मिलकर सरकार बना ली। ये गठबंधन 2 साल चला इन दो सालों में कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत संघ के इशारे पर नक्सलवाद को खड़ा किया।

1969 में राष्ट्रपति शासन लग गया, 1977 में बंगाल के लोगो की मति भ्रष्ट हो गयी और उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी को सत्ता थमा दी। एक समय था किसी को व्यापार करना हो तो बंगाल को स्वर्ग कहा जाता था लेकिन 1977 के बाद तो बंगाल सबसे बड़ा नरक था।

कम्युनिस्टों का सिर्फ एक ही जगह ध्यान था कि फेक्ट्री के मजदूर उन्हें वोट करते रहे, इसलिए उन्होंने उद्योगपतियों का जीना हराम कर दिया। वर्कर काम पर आए ना आए आपको सैलरी देना है। वर्कर की सैलरी इतनी बढ़ानी पड़ती थी कि आप नुकसान में ही चले जाओ।

लेकिन बंगाली दादा खुश थे क्योकि अब मुफ्त में बहुत कुछ मिल रहा था। उद्योगपतियों ने बंगाल से भागना शुरू कर दिया, 1985 तक तो कोलकाता की मानो लाश बिछ गई और उस पर मुंबई खड़ी थी। जो कुछ बंगाल का था वो अब महाराष्ट्र का होता गया, बिरला ग्रुप, जिंदल स्टील, टाटा सभी को अपना सामान बांधकर मुंबई आना पड़ा।

महाराष्ट्र की सरकारों ने दिल से इनका स्वागत किया, 21वी सदी का आरंभ होते होते तो लाश बन चुके कोलकाता का अस्थि विसर्जन भी हो गया। उत्तर में नोएडा गुरुग्राम से लेकर दक्षिण में बैंगलोर और हैदराबाद तक कम्पनियों में रेस लगी थी।

लेकिन किसी भी कंपनी का स्टॉप कोलकाता नही था, बंगाल के लोग आँख पर पट्टी बांधकर बैठे रहे और 1977 से 2011 तक कम्युनिस्टों को बैठाए रखा वो भी बहुमत से। 2011 में भी आसमान से गिरकर खजूर में लटक गए और ममता बनर्जी को ले आये। ममता बनर्जी ने भी उद्योगों के लिये कुछ नही किया।

1977 से आज तक वे यही गलती करते रहे। आप कहोगे की उनके पास विकल्प ही नही था बीजेपी तो अभी ही वहाँ गयी है। तो ये क्या करते?

इसका उत्तर है कि ये कांग्रेस को ही चुनते, कांग्रेस भी लुटेरी है लेकिन अमीर कोलकाता को कम अमीर बनाये रखती, भिखारी नही बनाती। अब आज हाल ये है कि 2026 तक तो ममता बनर्जी ही रहेगी उसके बाद शायद आप कुछ नया करो।

लेकिन ध्यान रहे ये दिल्ली मुंबई का युग है, दिल्ली कोलकाता वाला समय गया। आज नोएडा, गुरुग्राम, बैंगलोर, पुणे कोलकाता से प्रतिशत में नही बल्कि गुना में आगे है। 45 सालों में पूंजीवाद के प्रति इतना जहर घोल दिया है कि बंगाल तो अभी स्टार्टअप्स के बारे में भी नही सोच सकता।

लोग कहते है कि बंगाल 25 साल पीछे है या 30 साल पीछे है लेकिन आप गणना करेंगे तो बंगाल आज 100 साल पीछे है। कम्युनिस्टों और ममता रूल से अच्छा तो ये लोग अंग्रेजो के डंडों से काम कर रहे थे।

मगर देखिये जो होता है अच्छे के लिये होता है, यदि आप बंगाली है तो पढ़कर दुख होगा लेकिन यदि आप हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र या कर्नाटक से है तो मुस्कुराइये बंगाल की लाश पर आज आपकी मजबूत अर्थव्यवस्था खड़ी है।

क्योकि 1974 में एक समय था जब जिंदल परिवार स्टील के लिये प्लांट लगाना चाहते थे उन दिनों कागजी फॉर्मेलिटी में सालों लगते थे। हरियाणा और महाराष्ट्र की सरकार हाथ धोकर जिंदल परिवार के पीछे पड़ी थी लेकिन जिंदल ने कसम खा रखी थी कि वे कोलकाता ही जायेंगे।

1977 में वहाँ कम्युनिस्ट शासन आ गया, ज्योति बसु मुख्यमंत्री बना उसने जिंदल को ऐसा परेशान किया कि जिंदल को आखिरकार हरियाणा के हिसार में प्लांट डालना पड़ा। जिंदल ग्रुप का मुख्यालय आज भी नई दिल्ली में है और ये सब बंगालियों की तथाकथित एजूकेटेड सोसायटी की बदौलत हुआ।

जो बंगाल नौकरी देने के लिये जाना जाता था आज उसी बंगाल के लोग कश्मीर से कन्याकुमारी भटकते हुए पाए जाते है।

आज कोलकाता में सिर्फ वेयरहाउस और फ्रेंचाइजी जिंदा है, पूर्वी राज्यो में व्यापार के लिये बंगाल आज भी केंद्र है लेकिन इंडस्ट्रीज इन्ही विकसित राज्यो की है बंगाल तो महज एक जंक्शन है।

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