बाघों की नर्सरी बना रातापानी टाइगर रिजर्व, प्रदेश का इकलौता टाइगर रिजर्व जहां घट रहा जंगल, बढ़ रहा बाघों का कुनबा, 80 से 90 बाघों के विचरण के लिए जंगल पड़ रहा कम

सईद नादां, रायसेन

29 जुलाई को बनाया जाएगा अंतराष्ट्रीय बाघ दिवस

कभी शिकार और जंगल कटाई में सुर्खियां बटोरने वाला औबेदुलागंज वन मंडल में बीते एक साल में शिकार एवं वन कटाई की कोई घटना सामने नही आई वही जब से रातापानी टाइगर रिजर्व घोषित हुआ है तब से वन मण्डल के अधिकारी कर्मचारीयो काफी इस विषय को लेकर काफी गंभीर नजर आ रहे है। रातापानी पहले से ही बाघों सहित अन्य वन्यजीवों की सुरक्षित पनाहगाह बनकर उभरा था इसका सुखद पहलू यह है की टाइगर रिजर्व बनने से बीते एक वर्ष में जंगल कटाई और शिकार की एक भी घटना नही हुई। अगर टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बसे गांवों का विस्थापन हो जाए तो यह सेंचुरी बाघों के लिए स्वर्ग बन सकती है। बता दे की वर्ष 2010 -12 में यहाँ मात्र 8 से 10 ही बाघ थे उनका टेरिटेरियल एरिया भी काफी लंबा चौड़ा था। 15 वर्षो में बाघो का कुनबा आठ से दस गुना बड़ा वर्तमान में बाघों की संख्या लगभग 95 से 100 बताई जा रही है। जबकी बाघों के इस कॉरिडोर में देवास से बाड़ी तक 125 से अधिक बाघों के साक्ष्य मौजूद होने की जानकारी विशेषज्ञों द्वारा दी गई है। बाघों की संख्या बढ़ने के अनेक कारण है जिसमे एक यह भी है की यहाँ पर वन्यजीवों को वह सब चीजें आसानी से मिल जाती है जिनकी बाघों को आवश्यकता है जैसे शिकार,प्राकृतिक वातावरण आदि। अब इनका कुनबा बढ़ने टेरिटोरियल एरिया कम होने से आपसी संघर्ष की खबरे भी सेंचुरी से मिलने लगी हैं।


सात माह पहले घोषित हुआ टाइगर रिजर्व :

औबेदुल्लागंज वन मंडल के अंतर्गत आने वाला यह टाइगर रिजर्व में लगभग 95 से 100 बाघ और आधा दर्जन से अधिक बाघिनों के बारह से अठारह शावक होने के प्रमाण मिल रहे है। बताया यह भी जा रहा है की यहां 25 से 30 के बीच नर और बाकी मादा है। महकमें के जिम्मेदार अधिकारी ने बताया बाघों का कुनबा काफी बढ़ गया संख्या बढ़ने से टेरिटेरियल एरिया कम होने लगा यही कारण है की यह बाघों के बीच संघर्ष की परंपरा शुरू हो गई। वही इसके बाघ बाड़ी,भोपाल,सीहोर के जंगलों तक पहुँच रहे है। यहॉ प्राकृतिक सौंदर्य भरपूर है वही हजारों साल पुरानी रॉक पेंटिंग वाली वल्ड हेरीटेज साइट भीमबेटका भी इसी रिजर्व के बीचों बीच मे स्थित है। यहां के बाघों की सबसे महत्त्वपूर्ण खासियत यह है की इसके इतिहास में आज तक बाघ और मानव के बीच कोई संघर्ष नही हुआ। रातापानी में टाइगरों के संरक्षण और उन्हें प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध कराने के लिए वन विभाग द्वारा 10 गांवों को विस्थापित करने की योजना 2008 में बनाई गई थी जिस पर अमल आज तक पूर्ण नही हो सका। जबकी अब टाइगर रिजर्व बन गया कुछ ग्रामो को इससे बाहर कर दिया गया जबकी कोर और बफर जोन की सीमाएं सिकुड़ गई यही कारण है की बाघ अभ्यारण से निकलकर सामान्य वन मण्डल की सीमाओं में प्रवेश कर रहे है साथ ही रिजर्व एरिया के ग्रामो तक मे इनकी धमा चौकड़ी के समाचार आए दिन सामने आ रहे है। बाघों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा के हिसाब से सेंचुरी में बसे ग्रामो का विस्थापन जरूरी है इस दिशा में राजनैतिक दखल के चलते विस्थापन का काम अधूरा रह गया। इन ग्रामो में लगभग 5 हजार से अधिक की आबादी निवास करती है। रातापानी में आने वाले गांव झिरी बहेड़ा, जावरा मलखार,देलावाड़ी, सुरईढाबा, पांझिर, नीलगढ़, धुनवानी और मंथार को विस्थापित किया जाना था परन्तु राजनैतिक दख़ल अंदाजी के चलते यह कार्य सुस्त पढ़ गया। जो वन्य प्राणियों के लिए भारी पड़ रहा है।

फैक्ट फाइल:

-रातापानी टाइगर रिजर्व 972 वर्ग किलोमीटर:

-बाघो की संख्या 95 से 100:

-कारीडोर में 130 बाघों की मौजूदगी के साक्ष्य:

-157 बीट:

-वर्तमान में 5 से 8 किलोमीटर टेरीटोरियल क्षेत्र:

-होना चाहिए टेरीटोरियल एरिया 20 से 25 किलोमीटर:

-200 कैमरों से रखी जा रही नज़र:

इनका कहना है: -

बाघों के अनुकूल वातावरण,उनके भोजन के लिए पर्याप्त वन्यप्राणी प्राकृतिक वास,और सुरक्षा के माकूल इंतजाम के चलते बाघों की आबादी में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसके साथ ही चनौतियां भी बढ़ रहीं हैं। टाइगर रिजर्व की सीमाओं का निर्धारण हो गया ------ हेमंत रैकवार, डीएफओ औबेदुल्लागंज



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