पेरिस हमला से हाथ काटने तक की घटना कट्टरवादी संगठन पर प्रतिबंध की आवश्यकता


जब आपके अंदर कोई शत्रु ना हो तो बाहर के शत्रु आपको हानि नहीं पहुंचा सकते - विन्सटन एस चर्चिल 

सन 2020 में एक फ्रेंच शिक्षक जिन्होंने अपने विद्यार्थियों को मोहम्मद पैगम्बर से संबंधित कुछ कार्टुन दिखाया था उनकी जुम्मे के दिन विद्यालय से बाहर कट्टर मुसलमान द्वारा हत्या कर दी गई थी । इस घटना को पूरी आवाम के समक्ष प्रदर्शित किया गया और इसे अंजाम देने वाले को कोई पछतावा नहीं हुआ । 

इससे पहले इसी प्रकार की एक घटना को भारत के एक कट्टर और संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया द्वारा अंजाम दिया गया । पी . एफ.आई. ने इभनिंदा का आरोप लगाकर केरल के एक प्रोफेसर टी.जे. जोसफ का हाथ काट दिया । अपराधी इतने अधिक कट्टर थे कि पकड़ में आने के बाद भी उन्हें अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं था । इस घटना में पेरिस हमलावर जैसी समानता दिखती है । इन दोनों घटनाओं में एक मात्र अंतर यही पाया गया कि पेरिस अटैक ने विश्वव्यापी ध्यान आकर्शित किया क्योंकि यह घटना यूरोपीय देशों में घटित हुई , जबकि भारत में घटित हुई घटना पर किसी का ध्यान नहीं गया क्योंकि सहिश्णु भारतीय ने इसे एक मात्र घटना कहते हुए नकार दिया । लोगों के ध्यान की कमी के कारण पी.एफ.आई कार्यकर्ता का हौसला बढ़ा है और वे ऐसी गंभीर अपराध किये जा रहे हैं जैसे एन.एस. जी . कमांडो की हत्या , लव जिहाद को बढ़ावा देना राजनीतिक जगह लेने के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या , दिल्ली दंगों में सक्रिय भूमिका निभाना इत्यादि (सभी जांच के दायरे में) ।

 पेरिस घटना सभी उलेमाओं और नेताओं मुख्यतः भारतीय बुद्धिजीवियों के लिए एक जागृत करने की पुकार है । यह बिल्कुल सही समय है कि मौलाना एवं अभिभावक अपने बच्चों को बताएं कि ऐसी हिंसक घटना न केवल इस्लाम को घृणित करते हैं बल्कि यह इस्लाम के शांतिप्रिय , सहिश्णु , सामाजिक समानता , उच्च नैतिक आदेभा एवं आध्यात्मिक होने पर विरोधाभास दर्शाता है । 

परंतु शिक्षा देना काफी नहीं है क्योंकि पी.एफ.आई. जैसे कट्टर संगठन युवाओं के मस्तिश्क में जहर घोलने का काम कर रहे हैं जो शास्त्रों से ज्यादा सोभाल मीडिया पर भरोसा करते हैं । जबकि धार्मिक शिक्षा का कोई प्रतिस्थापन नहीं है , त्वरित कार्यवाई की दरकार है । पी.एफ.आई. पर प्रतिबंध कट्टरवादी संगठन को बढ़ने से रोकने की कड़ी में पहला कदम है ।

 कुरान ( 2 : 193-194 ) दर्शाता है कि मुसलमान केवल सकिय लड़ाकों से लड़ता है । यदि युद्ध के दौरान दुभमन के भी लड़ाके क्षमा मांगते हैं तो उन्हें क्षमादान देना चाहिए । भारतीय मुसलमान को आत्मचिंतन करना चाहिए कि क्या पी.एफ.आई. इस्लाम के धार्मिक शिक्षा को मानता है या फिर सत्ता में आने के लिए अपने एजेंडा को पूरा करना चाहता है । 





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