इंडियन फार्मा इंडस्ट्री में नॉन-आईपी ग्रेड आईएसओ प्रोपील एल्कोहल के उपयोग से उपभोक्ताओं को जोखिम

 


मध्य प्रदेश, इंडियन फार्मा इंडस्ट्री द्वारा फार्मा दवाओं के उत्पादन के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले आइसो प्रोपील एल्कोहल का 88% नॉन-आईपी (इंडियन फार्माकोपिया) ग्रेड रहता है। इस वजह से भारतीय उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य तथा भलाई और इंडियन फार्मा इंडस्ट्री की प्रतिष्ठा खतरे मे है।

आइसो प्रोपील एल्कोहल का अपना अन्तर्निहित एप्लीकेशन न केवल फार्मा इंडस्ट्री में किया जा रहा है, बल्कि हैंड सैनिटाइज़र सेगमेंट में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। हैण्ड सैनिटाइजर भारतीय उपभोक्ताओं द्वारा घर, ऑफिस, सिनेमा हॉल, शॉपिंग मॉल, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, होटल और रेस्टोरेंट, शिक्षा संस्थानों में व्यापक रूप से और आमतौर पर उपयोग किया जाता है।

यह देखा गया है कि इंडियन फार्मा इंडस्ट्री द्वारा खपत किए गए 170,000 एमटी का आईपीए में से केवल 12 प्रतिशत ही फार्मा ग्रेड भारतीय और अन्य फार्माकोपिया स्टैण्डर्ड को पूरा करते है, और बाकी का 88% नॉन-फार्मा ग्रेड होता है।

रेगुलेटरी (नियामक) एक्सपर्ट श्री विजयकुमार सिंघवी महाराष्ट्र सरकार में ऍफ़डीए में टेक्नीकल ऑफिसर रह चुके हैं। उनके अनुसार, दवा और कॉस्मेटिक अधिनियम की दूसरी अनुसूची की धारा 16 में फार्मा एप्लीकेशन के लिए आईपी स्पेक्स (विनिर्देशों) के उपयोग को अनिवार्य किया गया है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि फार्मा इंडस्ट्री में उपभोग किए जाने वाले अधिकांश आईपीए को नॉन-आईपी ग्रेड के रूप में खरीदा जाता है।

फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री में उपयोग किया जाने वाला नॉन-फार्मा ग्रेड आईपीए विभिन्न फार्माकोपिया स्टैण्डर्ड में शामिल विभिन्न महत्वपूर्ण पैरामीटर्स को पूरा करने में असफल हो सकता है। इन पैरामीटर में यूवी अवशोषण टेस्ट, बेंजीन और R पदार्थ, और नॉन-वोलाटाइल अवशेष / पदार्थ, अम्लता या क्षारीयता का परीक्षण शामिल होता है। श्री सिंघवी ने आगे कहा, "इन पैरामीटर को पूरा न करने की वजह से घटिया मैटेरियल का उपयोग होता है और जिससे दवा की क्वालिटी कम हो जाती है।

आइसोप्रोपिल एल्कोहल (आईपीए) को प्रोपलीन या एसीटोन को कच्चे माल के रूप में उपयोग करके दो अल्टरनेटिव रूट्स (वैकल्पिक तरीकों) द्वारा बनाया जा सकता है।

अमेरिका और यूरोप में अधिकांश वैश्विक कम्पनियाँ आईपीए का उत्पादन करने के लिए फीडस्टॉक के रूप में प्रोपलीन का उपयोग करती हैं, जबकि कई चीनी और कोरियाई कम्पनियाँ आईपीए का उत्पादन करने के लिए एसीटोन का उपयोग फीडस्टॉक के रूप में करती हैं।

श्री सिंघवी ने आगे बताया, "प्रोपलीन के जरिये उत्पादित आईपीए में अंतिम उत्पाद में कुछ सामान्य प्रोपाइल एल्कोहल और एसीटोन बच सकता हैं, लेकिन फार्मा एप्लीकेशन के लिए इससे कोई समस्या नहीं होती है।

जबकि एसीटोन से उत्पादित आईपीए में बेंजीन होने की संभावना रहती है, क्योंकि एसीटोन फिनोल उत्पादन में एक सह-उत्पाद होता है जिसके लिए बेंजीन प्रोपलीन के साथ एक फीडस्टॉक के रूप में रहता है। यह फार्मा उत्पादकों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

श्री सिंघवी के अनुसार,भारतीय बंदरगाहों पर मिक्स्ड टैंकों में भरे इम्पोर्ट किये गए आईपीए भी विभिन्न फार्माकोपिया स्टैण्डर्ड के शुद्धता स्टैण्डर्ड को पूरा नहीं कर सकते है। ऐसे इम्पोर्ट किये गए आईपीए का उपयोग भारतीय उपभोक्ताओं और भारतीय फार्मा उद्योग की प्रतिष्ठा के लिए खतरा पैदा कर सकता है।

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