गायत्री महायज्ञ के दूसरे दिन योगेंद्र शास्त्रीजी का हुआ व्याख्यान

गायत्री महायज्ञ का दूसरा दिवस

*सर्वशक्तिमान ईश्वर देने वाला है, हमसे कुछ नहीं लेता- योगेन्द्र शास्त्री*

महू , ईश्वर सर्वशक्तिमान है, सर्व व्यापक है। उसे ढूंढने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं ,उसे हम सच्चे मन से व श्रेष्ठ कर्मों द्वारा प्राप्त कर सकते है। उक्त विचार महू नगर में चल रहे गायत्री महायज्ञ के दूसरे दिन यज्ञ के ब्रह्मा आचार्य योगेंद्र शास्त्री ने यज्ञ के उपरांत अपने व्याख्यान में रखे । प्रात: काल आर्य समाज मंदिर महू में संपन्न यज्ञ में सौलह परिवारों ने आर्ष कन्या गुरुकुल ,मोहन बडोदिया से पधारी वेदपाठी कन्याओं द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार से आहुतियां प्रदान की। यज्ञ के उपरांत भजनोपदेशक आर्य काशीराम "अनल" एवं आचार्य "मोहित शास्त्री" ने सुमधुर भजनो की प्रस्तुति दी। स्वामी दयानंद के उपकार, वेद एवं परमात्मा पर आधारित भजनों की प्रस्तुति सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। सात वर्षीय बालिका अर्नवी गोस्वामी ने हारमोनियम बजाकर एक देशभक्ति पूर्ण भजन प्रस्तुत किया तथा खूब सराहना प्राप्त की । यज्ञ के ब्रह्मा आचार्य योगेंद्र शास्त्री जी ने ईश्वर की प्राप्ति किस प्रकार करें, विषय पर अपने विचार रखे। तथा लोगों के मन में ईश्वर के प्रति भ्रांतियों को दूर किया। 

श्री शास्त्री ने कहा कि ईश्वर देने वाला है, बदले में हमसे कुछ नहीं लेता। वह हमसे कुछ लेने की अपेक्षा नहीं रखता है। ईश्वर ने तीन ज्योतियां बनाई है सूर्य, अंतरिक्ष और आदमी। ईश्वर अर्थात प्रजापति को सोलसी भी कहते हैं। सोलसी अर्थात सोलह कलाओं का ज्ञाता। ऋषियों ने बताया परमेश्वर संसार का सृजन करने वाला है। परमेश्वर ने सूर्य की 12 व चंद्रमा की 16 कलाएं रची हैं । परमेश्वर की 16 कलाएं इस प्रकार हैं। पहली प्राण , प्राण अद्भुत है। प्राण के बिना संसार में कोई भी गतिविधियां नहीं हो सकती। प्राणों का प्राण वह परमेश्वरी ही है जितने भी प्राणी है उन सब को प्राण प्यारा है। प्राणों से प्यारा ईश्वर है दूसरा आकाश ईश्वर ने मनुष्य के लिए खाली स्थान के रूप में आकाश बनाया है। तीसरा वायु के बिना जीवन चक्र संभव नहीं है , चौथा अग्नि । अग्नि के बिना जीवन संभव नहीं है । पांचवा प्राणों के लिए वृक्ष वनस्पति अन्य आदि बनाकर ईश्वर ने उन्हें गति प्रदान की इंद्रियां इंद्रियों की संरचना खाने आदि के लिए करके की है आठवां - वीर्य , हम जो भी कुछ ग्रहण करते हैं खाते हैं वह अग्नि पदार्थ में जाकर हमारे शरीर में वीर्य का निर्माण करता है 

 नौवा है तप से हम अपने जीवन को अच्छा बनाते हैं दसवां है साहस । ग्यारहवां है मन संकल्प और विकल्प दोनों ही मन के भाव होते हैं अगला है मंत्र प्राणी को ज्ञान प्राप्त करने के लिए परमात्मा ने मंत्र बनाए हैं । पंद्रहवा नाम ईश्वर ने जो पदार्थ बनाए हैं उनके नाम भी दिए हैं और सौलहवां कर्म कर प्रत्येक व्यक्ति को कर्मशील होना चाहिए कर्म करते हुए ही व्यक्ति ईश्वरी कार्य को पूर्ण कर सकता है । कार्यक्रम में इंदौर , महू , धार , शाजापुर आदि स्थानों से पधारे लोग शामिल हुए । कार्यक्रम का संचालन गायत्री महायज्ञ के संयोजक श्री प्रकाश आर्य ने किया । उक्त जानकारी द्रोणाचार्य दुबे ने दी।