बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, सृजनशील कलाकार और सक्रिय समाजसेवी है अशोक धोड़पकर

हमे नाज़ है इन पर,,,


एक बुजुर्ग-बिरले किस्म का बहुआयामी सृजनशील कलाकार और सक्रिय समाजसेवी है


         अशोक धोड़पकर    


          ************* 


# जो परिचित-अपरिचित  


  व्यक्ति की मौत की खबर


  मिलते ही पहुंच जाते है 


  मुक्तिधाम और करते है


  दुःखी-व्यथित परिवारजनों


  की अपने तई तहे दिल से  


  सहायता


        *****************


इंदौर जिले के महू नगरी में 80 कम एक उम्र के अशोक धोड़पकर नामक एक प्रेरणादायी प्रयोगधर्मी कलाकार और निस्वार्थी सेवाभावी शख्स रहते है। महू के महाराष्ट्र समाज पथ पर रहनेवाले"अकेलेराम"


दुबली-पतली काया के -निरोगी अशोक युवावस्था से, लगभग 60 साल से सिर्फ महाराष्ट्र समाज के सामाजिक कार्यो के लिये ही नही अपितु अन्य समाजों के समाजहित के कार्यो लिये समर्पित व्यक्ति के रूप में जाने जाते है । गरीब-जरूरतमंद लोगों के लिये दिल खोलकर बगैर किसी अपेक्षा के मदत कर रहे है। आज भी रात में भी कोई उनके घर का दरवाजा खटखटाता है तो वे प्रसन्नतमुद्रा से अपनी


क्षमतानुसार हरसंभव सहयोग देने हेतु तत्पर रहते है। उम्र जैसी बात का उन पर कोई आसर नही है। वे धुन के पक्के है। अपनी कलासाधना में सतत रमे रहते है। महाराष्ट्र समाज संस्था को सजीव रखने हेतु प्रयत्नशील रहते है। उपाध्यक्ष होने के बावजूद विविध आयोजनों - रचनात्मक उपक्रमो में वे एक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहते है। बिछायत जमाने से लेकर उठाने का काम भी करते है। उनका अपना एक विशेष वजूद-प्रतिष्ठा है। मस्तमौला-हंसीमजाक करनेवाले खुशमिजाज अशोक का बड़ा लोकसंग्रह है। मजेदार-बातें और अक्सर शेरो-शायरी-दोहे- कहावतें सुनाने के आदी है। कबाड़ा- बेकार हो चुकी चीजों से बेहतरीन कलाकृतियां बनाने में माहिर है। वे हर साल दीपावली पर्व पर अपने घर में आकर्षक झांकिया निर्माण करते है। यह जिंदादिल शख्स हमेशा मराठी में एक बात जरूर सुनाता है "भ्याला तो मेला"(जो डर गया वह मर गया)। इस समाजसेवी की सबसे बड़ी जिक्र करने की बात यह है कि वह बरसो से गरीब परिवार में मौत होने का पता चलते ही उस परिवार को तत्काल सारी मदत करता है। इतना ही नही अंतिम संस्कार में पूरे समय मौजूद रहते है। इसके अलावा कई लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार अपने खर्चे से करवा चुके है।महू नगर में अंतिम संस्कार के लिए कंडो का ही इस्तेमाल किया जाता है। स्मशानभूमि अंतिम संस्कार के समय ये कंडे व्यवस्थित जमाने मे संवेदनशील अशोक सिद्धहस्त व्यक्ति है। वे महू में परिचित-


अपरिचित व्यक्ति की मौत की खबर पाते ही अंतयात्रा में शामिल हो जाते है। दुःखी


-व्यथित परिवार को श्मशान भूमि पर मदत करने सांत्वना देंव में उन्हे बहुत सुकून मिलता है। इसे वे बड़ा पुण्यकर्म मानते है। 


ऐसे बिरले निष्काम कर्मयोगी के जज्बे को मेरा हृदय तल से सलाम। आप भी निश्चित करोगे ही,,,,,


# विशेष:- विगत साढ़े चार 


   दशक से मैं बहुत करीब से


   इस समाज सेवी को जानता


   हूं। वे आत्मप्रचार से दूर


  रहते है। मुझे रहा नही जाने


  से उनकी अनुमति लिये बगैर


  यह प्रेरणादायी परिचय


  प्रस्तुत किया है।



 


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