ढोंग की जिन्दगी या ढंग की ? निर्णय आपका !!

आशीष यादव, धार 

ढोंग की जिन्दगी जीने वाले यह समझ नहीं पाते कि जीवन में परिणाम असल कर्म के मिलतें है,एक्टिंग के नहीं।इसके बनिस्बत जो लोग ढंग की जिन्दगी जीते हैं वे दिल के सच्चे, नेकनीयत ,ईमान के पक्के , और वादे में खरा उतरने वाले होते हैं । उन्हें पता होता है कि ढोंग के मुकाबले ढंग से जीने में ही भलाई है।

आईए समझतें है कि बेहद कठिन परिस्थिति में जन्म लेने के बाद भी ढंग की जिन्दगी जीने की चाहत ने निक वुजिसिक को कहॉं से कहॉं पहुँचा दिया ।

1982 को मेलबर्न ऑस्ट्रेलिया में बिना हाथ-पैरों के जन्मे,निक वुजिसिक ने सामान्य जीवन जीने के लिए भी बचपन में कड़ा संघर्ष किया । हाथ- पैर नहीं होने की वजह से जीवन बहुत ही मुश्किल था ।फिर भी माता-पिता की मेहनत से निक ने 6 वर्ष की उम्र में तैरना सीखा । इनके माता-पिता ने इन्हें स्पेशल स्कूल के बजाए सामान्य स्कूल में दाखिला कराया । वहॉं सहपाठी बच्चों के कमेन्ट से परेशान होकर 10 वर्ष की उम्र में निक ने पानी के टब में डूबकर आत्महत्या करने की कोशिश की ।

जब निक 13 वर्ष के थे, तब उनकी मॉं ने अखबार में प्रकाशित एक कहानी को पढ़कर सुनाया । जिसमें एक विकलांग व्यक्ति के संघर्ष व उसकी सफलता की कहानी छपी हुई थी ।इसके बाद निक ने ढंग से जीवन के लिए कमर कस ली ।साथ ही खुद के विकलांग जीवन से अन्य लोगों को प्रेरणा और मार्गदर्शन देने का काम शुरू किया । 17 वर्ष की उम्र में पहले भाषण से लेकर आज विश्व के जाने-माने सफल मॉटीवेशनल स्पीकर हैं ।40 वर्षीय निक वुजिसिक ने कई किताबें भी लिखी हैं ।जिसमें 2010 में लिखी किताब “ लाईफ विदाउट लिमिट “ काफी लोकप्रिय है ।

                बिना हाथ-पैरों के जन्में निक वुजिसिक ने ढंग की जिन्दगी जीने के चलते, अपनी जन्मजात विकलांगता की परवाह न करते हुए दुनिया के सामने बहुत बड़ी मिशाल क़ायम की है ।संघर्षशील लोग ढंग की जिन्दगी जीने की चाह में अपने व्यक्तित्व को बहुत गहरा व बड़ा बना लेते हैं । वहीं ढोंगी लोग झूठ, फरेब, और ठगी करके क्षणिक सुख तो पा सकतें हैं , परन्तु समय आने पर उन्हें सूद सहित लौटाना पड़ता है ।फिर वे पूरे जीवन सुकून, शांति और आनंद से वंचित रह जाते हैं ।

लेखक- नागेश्वर सोनकेशरी ने पूर्व में अद्भुत श्रीमद्भागवत ( मौत से मोक्ष की कथा ) की रचना भी की है । 



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