नए दौर की पत्रकारिता शिक्षा पर दो दिवसीय राष्ट्रीय वेबीनार

 मीडिया शिक्षा मानवता केंद्र होने से मीडिया का चेहरा मानवीय होगा - प्रो आशा शुक्ला

मीडिया शिक्षा राष्ट्रीय मूल्यों, संस्कृति और लोक और ज्ञान परंपरा पर केंद्रित होना चाहिए - प्रो. शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी
महू। पत्रकारिता में विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। मीडिया समाज का आईना है, मीडिया का मानवीय चेहरा ही ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए। तात्कालिकता भी इलेक्ट्रॉनिक को सोशल मीडिया के लिए महत्वपूर्ण पक्ष हैं। कई बार ऐसा होता है जो कहा नहीं जाना चाहिए वह प्रसारित हो जाता है,  जो समाज को क्षति पहुंचाता है कई अनेक सामाजिक समस्याएं हैं जिन पर मीडिया का ध्यान जाना चाहिए जैसे जेंडर संवेदनशीलता एक मुद्दा है जिस पर मीडिया प्रभावी भूमिका निर्वाह करने के लिए अपनी नीतियों को निश्चित कर सकता है। कोरोना काल में मीडिया की प्रबल भूमिका में  सामाजिक सरोकारों का पक्ष भी उभर कर सामने आया है। यह सभी मीडिया शिक्षा में आना चाहिए। उक्त विचार डा. बी आर अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू की कुलपति प्रोफेसर आशा शुक्ला ने "नए दौर में मीडिया शिक्षा चुनौतियां और संभावनाएं" दो दिवसीय राष्ट्रीय वेबीनार में अध्यक्षीय उद्बोधन में व्यक्त किए। जिसका आयोजन माधव विश्वविद्यालय आबू रोड राजस्थान और डॉ. बी आर अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय महु के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था।
इससे पूर्व मुख्य वक्ता प्रो सुरेंद्र पाठक, सलाहकार, ब्राउस ने कहा कि पत्रकारिता के पुनर्परीक्षण और पत्रकारिता पाठ्यक्रमों की पुनर्संरचना की आवश्यकता है। पत्रकारिता का दर्शन और दृष्टि मानवीय ही हो सकती है। पत्रकारिता व्यक्ति, समुदाय, विचार आदि की संकीर्ण सीमाओं में अभिव्यक्त होने वाली क्रिया नहीं है। पत्रकारिता शिक्षा में विचारधाराएं, मानवीय आचरण, संविधान का प्रयोजन, पर्यावरण सरंक्षण, मुख्य वैश्विक समस्याएं एवं उनके समाधान, संक्षेप में दर्शन और संस्कृति परंपरा और  अकादमिक विषयों के संक्षिप्त इतिहास को शामिल किया जाना चाहिए। इससे छात्रों के दृष्टिकोण को व्यापक, समग्र और सर्वांगीण बनाया जा सकता है। साथ ही विशेष विषयों की पत्रकारिता के अनेक कोर्स प्रारंभ किए जा सकते हैं। डा. पाठक ने कहा कि नए दौर में पत्रकारिता शिक्षा के समक्ष जितनी बड़ी चुनौतियां हैं उससे भी ज्यादा संभावनाएं हैं।
राष्ट्रीय सेमिनार में विशिष्ट वक्ता पूर्व संपादक व प्रोफेसर शैलेंद्र मणि त्रिपाठी, आचार्य, बाबू जगजीवनराम शोध पीठ, अंबेडकर विश्वविद्यालय, महू ने कहा की जब हम पत्रकारिता मीडिया शिक्षा की बात करते हैं तो भारतीय शिक्षा प्रणाली पर बात करना आवश्यक हो जाता है। गुरुकुल की प्रणाली विशुद्ध व्यावहारिक थी, इसके बाद ब्रिटिश काल के दौरान थोपी गई शिक्षा प्रणाली विशुद्ध रूप से सैद्धांतिक होकर भारतीय मूल जड़ों से कट गई। ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली से पूर्व भारत में साक्षरता 96% थी, तथा ब्रिटिश संसद में पेश शिक्षा बिल में यह उद्धृत किया गया था कि भारत में नौकरी, भिखारी और चोरी नहीं है, भारत में उच्च नैतिक आदर्शों वाले लोग रहते हैं। जिन्हें यह बताना होगा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था से बेहतर विलायती शिक्षा है । इसी को ध्यान में रखकर भारतीय शिक्षा प्रणाली में बदलाव किया गया था। जिसका परिणाम देश के सामने है। भारत में शिक्षा व्यवस्था राष्ट्रीय मूल्यों, संस्कृति और लोक परंपराओं के साथ ज्ञान परंपरा पर केंद्रित होना चाहिए, इसी को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बनाई गई है। इस दरम्यान पत्रकारिता में भी काफी बदलाव आया है। तकनीकी और बाजार के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए इसे व्यापक बनाने की जरूरत है। इसी कारण अंबेडकर यूनिवर्सिटी  ने न्यू मीडिया, मोबाइल जर्नलिज्म, सोशल मीडिया, स्क्रिप्ट एवं ब्लॉग राइटिंग आदि विषयों पर डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारंभ करने का निर्णय लिया है। मीडिया में भी भारतीय दृष्टि को प्रबल करने की जरूरत है ताकि राष्ट्र सशक्त हो सके, राष्ट्रहित सर्वोपरि है। वही दूसरे वक्ता के रूप में द्रोणाचार्य शासकीय महाविद्यालय के सह प्राध्यापक डॉक्टर सुभाष में आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में मीडिया की स्थिति में आए बदलाव और उसके व्यापारिक सामाजिक आज के समय में इसके व्यवसायीकरण की ओर ध्यानाकर्षण कराया।
कार्यक्रम की शुरुआत में मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता डॉ देवेंद्र मुजाल्दा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया।
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन अध्यक्षता करते हुए माधव विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर गोविंद सिंह ने मीडिया शिक्षा और उसके उसमें नकारात्मक खबरों की ओर ध्यान आकृष्ट किया। इसी सत्र में राजस्थान विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर संजीव भानावत ने मीडिया की भाषा और भाषा संस्कारों पर विस्तार से चर्चा की। वहीं झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देवव्रत सिंह ने मीडिया में हो रहे बदलावों और उसकी तीव्रता की बात कही। वहीं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राघवेंद्र मिश्रा ने मीडिया शिक्षा के उद्भव और उसके बाद इसमें उभरे रोजगार की संभावनाओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए। राष्ट्रीय वेबीनार में अनेक राज्यों से ऑनलाइन प्रतिभागी उपस्थित थे। जिसमें डॉक्टर विदुषी आमेटा, डॉ कल्पना मौर्य, डॉ एम एल मोरे, मुकेश भिड़े, कमल उपाध्याय, डॉ राम अवतार, डॉक्टर सरला पंड्या, डॉक्टर नरेंद्र ओझा, डॉक्टर निशा वैष्णव, लोकेश सिंह गुर्जर, डॉ. मनोज गुप्ता अधिष्ठाता, डॉ. मनिषा सक्सेना, डॉ देवाशीष देवनाथ, डा. रामशंकर, डॉ अजय दुबे, जितेंद्र पाटीदार, डॉ चेतना बोरीवाल, डॉ बिंदिया तातेड, डॉ  शैलेंद्र मिश्रा एवं अनेक प्रतिभागियों सहित विद्यार्थियों की बड़ी संख्या में भागीदारी देखी गई।
कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर रेणुका ने रूपरेखा ऋषिकेश कुमार गौतम और और अमृत लाल जिंजर ने कार्यक्रम के 2 दिनों का सारांश प्रस्तुत किया। इस वेबीनार में डॉ महेंद्र सिंह, डॉक्टर सुधा पांडे, डॉक्टर रविंद्र गुप्ता, डॉक्टर संजय परिहार, डॉक्टर कांति लाल यादव डॉक्टर जय सिंह, डॉ पी के सिंह, चेतना जोशी, देवराज सिंह आदि की भी सक्रिय भागीदारी रही।