नौकरी में आरक्षण का मामला: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से LJP और कांग्रेस असहमत

 सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में इस बात का जिक्र किया कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के लिए कोटा और आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है. शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्यों को कोटा प्रदान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है और राज्यों को सार्वजनिक सेवा में कुछ समुदायों के प्रतिनिधित्व में असंतुलन दिखाए बिना ऐसे प्रावधान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर राजनीतिक दलों ने असहमति जताई है. भाजपा के सहयोगी दल लोजपा ने केंद्र सरकार से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अलावा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को दशकों से मिलते आ रहे आरक्षण के लाभों को इसी तरह से जारी रखने को सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की रविवार को अपील की है. लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान ने उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय से अपनी पार्टी की असहमति को प्रकट करने के लिए ट्वीट किया, जिसमें कहा गया है कि राज्य सरकारें इन समुदायों को सरकारी नौकरियों या पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं हैं.

पासवान ने कहा, “लोजपा उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय से सहमत नहीं है. पार्टी की मांग है कि केंद्र सरकार अभी तक की तरह ही नौकरी और पदोन्नति में आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए त्वरित कदम उठाए.” सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर कांग्रेस ने भी असहमति जताई और बीजेपी पर भी निशाना साधा. कांग्रेस ने कहा कि वह नियुक्तियों और पदोन्नतियों में आरक्षण के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से असहमत है. पार्टी ने आरोप लगाया कि बीजेपी शासन में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों के अधिकार खतरे में है. कांग्रेस महासचिव मुकुल वासनिक ने यहां पार्टी मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि पार्टी इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह उठायेगी.

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि राज्य सरकारें नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है तथा पदोन्नति में आरक्षण का दावा कोई मूल अधिकार नहीं है. बता दें कि जज एल नागेश्वर राव और जज हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा, "इस कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के मद्देनजर इसमें कोई शक नहीं है कि राज्य सरकारें आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है. ऐसा कोई मूल अधिकार नहीं है जिसके तहत कोई व्यक्ति पदोन्नति में आरक्षण का दावा करे." उत्तराखंड सरकार के 5 सितम्बर 2012 के फैसले को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शीर्ष न्यायालय ने यह टिप्पणी की.