शहर के उद्यान या उद्यानों के श्मशान....., इनकी फिक्र कीजिये यहां मनाईये पर्यावरण कार्यक्रम

आशीष यादव, धार

उद्यानों की जमीनों पर मंदिरों का निर्माण, ना कोई अनुमति ना कोई रोक-टोक

मोहल्ले-कॉलोनियों में बच्चों के लिए खत्म हो रहे हैं पार्क

पुराने उद्यानों के प्रति आम नागरिक से लेकर नगरपालिका की बेरूखी, नवीन पार्क के निर्माण पर करोड़ों का खर्च 

विधायक बंगले से इंदौर नाके तक 300 मीटर की दूरी में बना दिए 4 करोड़ों के उद्यान

शहर में कॉलोनी और मोहल्लों में बने 30 से अधिक उद्यान लगातार बदहाल होते जा रहे हैं। कई क्षेत्रों के उद्यान प्रयोगशाला बन गए हैं। जहां पर उद्यान के स्थान पर सीमेंट कांक्रीट के कार्यों से उद्यान का स्वरूप खत्म कर दिया गया है। शहर के बगीचों के हालात यह है कि उद्यानों में ना पेड़ है और ना पौधे और ना ही हरी घास बची है। वर्तमान में खुले मैदान जैसे उद्यान पर्यावरण बढ़ाने जैसे कार्यक्रमों को मुंह चीढ़ा रहे हैं। काम का बोझ, किसे हो फिक्र

बढ़ते शहर और योजनाओं एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के बोझ तले दबे नगरपालिका के पास शहर के उद्यानों की सुध लेने की फुर्सत नहीं है। वहीं आम लोगों की अपने-अपने मोहल्लों और कॉलोनियों के बगीचों के प्रति संवेदनशीलता बची है। उद्यानों के खत्म होने से सर्वाधिक प्रभावित हरियाली के इर्द-गिर्द रहने वाले पशु-पक्षी हो रहे हैं। वहीं बच्चों के लिए मोहल्ले में अब पार्क नहीं बचे है। शहर के उद्यान सिर्फ पर्यावरण या खेल-कूद की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि सामाजिक स्तर पर लोगों को एक-दूसरे से कभी तफरीह, कभी खेलकूद के बहाने जोड़े रखते हैं।

कार पार्किंग बन गए उद्यान

शहर के उद्यानों का हरियाली वाला स्वरूप भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन उद्यानों के नाम पर पैसा खर्च करने का सिलसिला जारी है। धार किले के सामने मंडलोई पार्क है। इस पार्क की भूमि का एक बड़ा हिस्सा नगरपालिका ने दिलावरी जलावर्द्धन योजना के तहत पानी की टंकी बनाकर आरक्षित कर लिया है। इसके बाद शेष हिस्सा अब लोगों की कार पार्किंग के काम आ रहा है। सबसे मुख्य बात यह है कि इस उद्यान में पुरा ने दो-तीन पेड़ है, लेकिन मैदान में घास का तिनका तक नहीं है। इसी पार्क में विधायक निधि से जिम्नेशियम लगा दिया है। जिम्नेशियम की स्थिति यह है कि उद्यान की और अतिक्रमण करने वाले परिवारों के बच्चों को ही जानकारी है यहां कसरत के लिए मशीनें लगी है। दरअसल टंकी के पीछे के हिस्से में लगाई गई मशीनें दिखाई नहीं देती है।


किले के सामने स्थित उद्यान की बदहाल स्थिति, बाउंड्रीवाल बना दी, हरियाली की फिक्र नहीं

शहर के विक्रम नगर कॉलोनी में उद्यान की भूमि पर उद्यान विकसित करने एवं सौंदर्यीकरण कार्य के लिए डेढ़-दो वर्ष पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष पर्वतसिंह चौहान ने शुभारंभ किया था। बाउंड्रीवाल बनाकर जमीन की सुरक्षा कर दी गई है, लेकिन उद्यान के नाम पर पेड़-पौधे और घास नहीं है। कुछ इस तरह की स्थिति जनता कॉलोनी के बगीचे की है। लोगों ने यहां पर शेड बनाकर अपने वाहन पार्क करना शुरु कर दिया है। कमोबेश इस तरह की दुर्दशा का शिकार शहर के अधिकांश बगीचे हो रहे हैं। महात्मा गांधी उद्यान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।


विक्रम नगर के बगीचे की वर्तमान की बदहाल स्थित, उद्यान की भूमि पर विकसित होते मंदिर

नगरपालिका को शहर के उद्यानों की फिक्र नहीं है। फिक्र है तो देखरेख के लिए कर्मचारी की कमी है। हालात यह है कि शहर के उद्यानों पर छोटी मूर्तियां रखने के बाद बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण हो रहा है। कई उद्यान तो अब देखने पर मंदिर और मंदिर परिसर ही लगते हैं। चिटनीस चौक स्थित उद्यान में झूले के लिए स्टैंड लगा है। झूले नहीं है। बच्चे खेल नहीं सकते, क्योंकि पार्क में हरियाली नहीं है। इसी उद्यान के अंदर पुराने पीपल के पेड़ के पास चबुतरे को अब मंदिर की शक्ल देने की कोशिश की जा रही है। सवाल मंदिर बनाने का नहीं है। सवाल यह है कि उद्यान क्यों खत्म किए जा रहे हैं। मंदिर बन रहे हैं तो इसकी अनुमति कौन दे रहा है। यदि बगैर अनुमति के यह सब हो रहा है तो यह कब बंद होगा।


चिटनीस चौक पर उद्यान जहां पर बन रहा है मंदिर, कॉलोनियों में भी बदहाल हो रहे बगीचे

नगरपालिका के पास समय नहीं है तो अब शहर के नागरिकों के पास भी जिम्मेदारी उठाने के लिए वक्त नहीं है। यही कारण है कि मोहल्लों के ही नहीं कॉलोनियों के बगीचे भी बदहाल हो रहे हैं। शहर की सबसे पॉश कॉलोनी काशीबाग में पिछले हिस्से के बगीचे में सूखे झाड़-झंकड खड़े है। विस्तृत परिसर होने के बावजूद हरियाली ना होने के कारण उद्यान नहीं उद्यान का श्मशान दिखता है। कमोबेश यही स्थिति शहर के अधिकांश कॉलोनियों के बगीचों की है।


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यहां मनाइए पर्यावरण दिवस

पर्यावरण दिवस पर पौधे रोपने की प्रतिस्पर्धा चलती है। टारगेट लेकर पौधे रोपे जाते हैं। इसमें आम लोगों से लेकर सामाजिक संस्थाएं तक अग्रणि रहती है। हालत यह रहत है कि जहां हरियाली रहती है वहीं जगह ढूंढकर पौधे रोप दिए जाते हैं। पर्यावरण दिवस की वास्तविक सार्थकता अब शहर के उजाड़ पड़े उद्यानों को पुन: हरित करने से सार्थक होगी। अभी बारिश के मौसम में दो माह का समय शेष है। नगरपालिका ने शहर के सूखे तालाबों से मिट्टी खुदाई के लिए प्रक्रिया शुरु कर दी है। मिट्टी किसानों को मिले, लेकिन उसके पहले शहर के उद्यानों में नर्म काली मिट्टी डालकर उद्यान का स्वरूप तैयार करने की प्रक्रिया करने के प्रयास होना चाहिए। मोहल्लों में समिति बनाकर आसपास के नागरिकों को ही देखरेख की जिम्मेदारी सौंपना चाहिए। नपा में कार्यरत माली को इन उद्यानों को विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपना चाहिए।

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300 मीटर की दूरी में 4 बगीचे

शहर में मौजूद जहां पुराने उद्यान बदहाल हो गए है। वहीं बीते कुछ सालों में नवीन उद्यान निर्माण के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं। इनमें चार बगीचे तो आॅफिसर कॉलोनी और विधायक बंगले क्षेत्र में बना दिए गए हैं। इंदौर नाके से विधायक बंगले की 300 मीटर की दूरी में करोड़ों रुपए के 4 बगीचे बना दिए है। एक बगीचा नवीन उद्यान के नाम पर लालबाग के पिछले हिस्से में विकसित किया गया है। इधर लालबाग में प्रवेश करते ही सीधे हाथ के हिस्से में एक बड़ी हरित भूमि वर्तमान में धीरे-धीरे बंजर होती जा रही है। इसे उद्यान के एक हिस्से का स्वरूप देकर विकसित किया जा सकता था, लेकिन नया उद्यान बनाना फायदे का सौदा हो रहा है।







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