टीचर एजुकेशन एवं स्कूल एजुकेशन की बराबर भूमिकाएं हैं- प्रो. आशा शुक्ला, टीचर एजुकेशन को पुनर्परिभाषित करते हुए हमारी दृष्टि जितनी स्पष्ट होगी हमारा लक्ष्य उतना ही आसान होगा- प्रो. एच. के. सोनापति

दिनांक-20/06/2020 डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय,महू द्वारा ‘रि-डिफाइनिंग टीचर एजुकेशन ड्यूरिंग एंड पोस्ट कोविड-19’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में बतौर मुख्य अतिथि एन. सी. ई. आर. टी., नई दिल्ली के निदेशक प्रो. एच. के. सोनापति ने अपने उद्बोधन में टीचर एजुकेशन और स्कूल एजुकेशन के बीच में के संबंधों की रिक्तता पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि क्लास रूम से लेकर परीक्षा की प्रक्रियाओं तक में आने वाली कई सारी चुनौतियों की एक बड़ी वजह टीचर और स्कूल एजुकेशन के बीच गैप है। पाठ्य सामाग्री, पैडॉगाजी और तकनीकी के साथ सहज एवं प्रभावी अंतरसंबंध स्थापित करते हुए ही हम शिक्षा के क्षेत्र में 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना कर नई संभावनाओं की ओर बढ़ पाएंगे। इन अंतरसंबंधों की मजबूती और रिक्तता को समाप्त करने से ही बच्चों को एक बेहतर नागरिक, संवेदनशील मनुष्य, तर्कशील विद्यार्थी बनाया जा सकता है, शिक्षण की यही अपेक्षा भी होती है। टीचर एजुकेशन को पुनर्परिभाषित करते हुए हमारी दृष्टि जितनी स्पष्ट होगी हमारा लक्ष्य उतना ही आसान होगा। बीज वक्ता के रूप में नागपुर से जुड़ी डॉ. राजश्री वैष्णव ने शिक्षण में स्थानीय/लोकल भाषा को शामिल करने पर जोर देते हुए कहा स्कूलों को समाज से जोड़ना होगा। अजमेर से जुड़े प्रो. एस. बी. सिंह ने भारतीय शिक्षण और ज्ञान परंपरा के महत्व पर बात करते हुए कहा कि हमें टीचिंग, ट्रेनिंग और एजुकेशन में अंतर को समझना होगा। उन्होंने लर्निंग को टीचिंग से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बताया। टीचर एजुकेशन और स्कूल एजुकेशन में किसी एक के भी कमजोर होने की स्थिति में शिक्षण के उद्देश्यों के प्रभावित होने की बात कही।


 


अमरावती विवि. से उपस्थित डॉ. गजानन गुल्हाने ने नवाचारी और डिजिटल माध्यमों ‘मूक एवं स्वयं’ जैसे निःशुल्क ऑनलाइन शिक्षा प्रदाता इकाइयों पर विस्तार से बात रखी। स्वयं, जहां स्कूल शिक्षा से लेकर स्कूल की सीमा से बाहर तक की शिक्षा के विस्तृत डिजिटल माध्यम को सबसे उपयोगी प्लेटफार्म के रूप में बताया। किसी भी समय, किसी भी जगह और किसी भी उम्र के लोग इस डिजिटल माध्यम से जुड़कर ज्ञान अर्जन कर रहे हैं। टीचर एवं स्कूल एजुकेशन के संदर्भ में देखें तो इनकी एक खास भूमिका भूमिका बन रही है।


 


डॉ. सुमन लता सक्सेना ने कहा कि इस वैश्विक महामारी ने शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को डिजिटल माध्यमों पर आने को बाध्य किया है। शिक्षण को जारी रखने इस नवाचारी तरीके में ग्रामीण सुर सुदूर इलाकों के विद्यार्थियों के सामने चुनौतियाँ भी हैं। टीचर एजुकेशन के साथ स्कूल एजुकेशन के पुनर्परिभाषित करते एवं पैडॉगाजी निर्माण में हमें इस दौर की चुनौतियों और संभावनाओं को संदर्भित करते हुए आगे बढ़ाना है। डॉ. लक्ष्मण सिंदे ने डिजिटल शिक्षण माध्यमों के उपयोग में विद्यार्थियों के साथ शिक्षण अधिगम अंतरक्रियाओं और शिक्षण प्रवृत्तियों को ठीक करने के साथ सुलभ बनाने के लिए इस क्षेत्र में शोध करने को महत्वपूर्ण और आवश्यक बताया। अध्यक्षीय उद्बोधन में ब्राउस कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने इस गंभीर चुनौती के बीच टीचर एजुकेशन एवं स्कूल एजुकेशन की बराबर भूमिकाओं और उसे पुनर्परिभाषित किए जाने को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा इस गंभीर चुनौती के बीच शिक्षक, विद्यार्थी और संस्थाओं ने बिना रुके नए माध्यमों के जरिये नई संभावनाओं और अवसरों की तलाश की है। शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र और समाज की बेहतरी में लगे विद्यार्थियों के साथ-साथ शिक्षकों के सामने यकीनन चुनौतियाँ हैं, परंतु वे इससे आगे बढ़ते हुए अपनी जिम्मेदारीपूर्ण भूमिकाओं के निर्वाह की निरंतरता में लगे हैं। कार्यक्रम का संचालन वेबिनार संयोजक डॉ. हिमानी उपाध्याय एवं धन्यवाद ज्ञापन समन्वयक डॉ. मनीषा सक्सेना ने दिया।  



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