नाटक की अनावशयक लंबाई ,किस तरह से एक मंजे हुए निर्देशन और कसे हुए अभिनय पर पानी फेर देती है जिससे नाटक का अपेक्षित प्रभाव कमतर होता जाता है।
यही हुआ इंदौर की नाट्य संस्था पथिक द्वारा अभिनित नाटक छोड़ो कल की बातें ,जिसका मंचन वेटरनरी कॉलेज महू के सभागृह में हुआ। यह नाटक का चयन खासतौर से आयोजकों के लिए एक मायने में जोखिम भरा ही था , क्योंकि आज के दौर में छात्र छात्राओं और युवा दर्शकों के लिए वृद्धाश्रम जैसे गंभीर विषय पर नाटक खेलना एक रिस्क लेने के बराबर ही है। गौरतलब है कि आमतौर पर आज का युवा , नाटक हो या फिल्म, हो , कॉमेडी, रोमांस या सस्पेंस से भरपुर मसाला कहानियों को पसंद करता है।
नाटक छोड़ो कल की बातें एक ऐसे वृद्धाश्रम की कहानी है जिसमें रहने वाले तीन बुजुर्गो की अपनी अपनी व्यथा है। बच्चों से मिले तिरस्कार,दुनिया से मिली बेरुखी से आहत इन बूढों ने ठान लिया है कि पिछली बातों से ग़मज़दा न होकर अपनी जीवन शैली में भरपूर आनंद से रहना है। और अचानक कहानी में पड़ोस के वृद्धाश्रम में रहने वाली महिला प्रविष्ट होती है।फिर तो युवा दर्शकों द्वारा तालियों और शोर से दिया गया प्रतिसाद देखने लायक था।
श्री सतीश श्रोत्री द्वारा निर्देशित और जयवर्धन द्वारा लिखित इस नाटक में सभी पात्रों का अभिनय बहुत सधा हुआ था। जाहिर था, नाटक का गांभीर्य पूरे समय तक दर्शकों पर तारी रहा। वृद्धों द्वारा आपबीती सुनाते सुनाते कई दर्शकों के आंखों में आंसू भी गए, और यह नाटक की जीत है।
हालांकि संवाद संप्रेषण उत्तम होने के बावजूद
एक पात्र महावीर की भूमिका निभा रहे श्री नंद किशोर बर्वे अपनी आवाज की स्लो पेस के चलते कई बर दर्शकों तक नहीं पहुंच पाए और यहां नाटक की पकड़ ढीली पड़ गई।जगलाल की भूमिका कर रहे दिलीप नजन की पुरजोर आवाज और घनश्याम की भूमिका कर रहे संजय पांडे का अभिनय लालित्य प्रशंसनीय रहा। उमा जी की भूमिका कर रही शोभना विसपुते ने भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया और टप्पू की भूमिका में राहुल प्रजापति थे जिन्होने युवा दर्शकों का ध्यान रखते हुऎ उन्हें हंसा हंसा कर लोटपोट किया। कुल मिलाकर उम्दा प्रकाश संयोजन, बेहतरीन ध्वनि व्यवस्था यह मंचन कुछ सुधारों के साथ बेहतर हो सकता है। महू जैसे शहर में जहां पर व्यावसायिक नाटक नहीं खेले जाते, वेटरनरी कॉलेज महू की सांस्कृतिक संस्था का यह प्रयोग अभिनव था जो पुरी तरह सफल रहा। अंत तक खचाखच भरे हॉल तथा कलाकारों के हिस्से में आई झमाझम तालियां महू में नाट्य परंपरा के प्रति रुझान का एक शुभ लक्षण है।



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